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ओस की बूंदों से

दिल के अनुसार नहीं होता

पांव से कह रहा है

कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस

ख़्वाब रखता हूँ

न कोई मंजिल के निशां

है ऐसा या वैसा या जैसा नदीश

सारी दुनिया भुला दी

आईना बन जायेगा

ठंडी हवा की आँच

दौर-ए-हाज़िर में नकाब है ज़िन्दगी

जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

हर लम्हां गुजरता है

आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे

छिपा सकते हो कब तक