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जाने-ग़ज़ल

तहखाने नींद के

मेरे एहसास की तितली

कितना बवाल था

रिश्तों की ये पतंग

दर्द कोई जब

कुछ नहीं

जलते शहर से

सरापा दास्तां हूँ

चाँद खिल गया