तुम्हारे हिज़्र में

गिर रही है आँख से शबनम तुम्हारे हिज़्र में
एक ही बस एक ही मौसम तुम्हारे हिज़्र में

क़तरे-क़तरे में शरारों सी बिछी है चांदनी 
बन गयी है हर ख़ुशी मातम तुम्हारे हिज़्र में

आईना-ओ-धूप के बिन अक्स न साया मेरा
किस क़दर तनहा हूँ मैं हमदम तुम्हारे हिज़्र में

खो गयी है अब नज़र की तिश्नगी जाने कहाँ 
अश्क़ में डूबा है ये आलम तुम्हारे हिज़्र में

दे भी जाओ अब सनम आकर सुकूं दिल को मेरे
या बता जाओ करें क्या हम तुम्हारे हिज़्र में

तुम नहीं तो सांस भी भारी लगे है बोझ सी
यूँ ही निकलेगा लगे है दम तुम्हारे हिज़्र में

फ़िक्र-ए-दुनिया है न खुद की है ख़बर कोई मुझे
अब ख़ुशी है न ही कोई ग़म तुम्हारे हिज़्र में

फूल उम्मीदों के सारे आज कांटे बन गए 
हर क़दम पतझर का है मौसम तुम्हारे हिज़्र में

एक-एक लम्हा लगे है अब क़यामत सा नदीश
ख़्वाब भी होने लगे हैं नम तुम्हारे हिज़्र में
चित्र साभार- गूगल

ठहरी है ग़म की झील में


रुख़ से ज़रा नक़ाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
महफ़िल में इज़्तिराब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

इस आस में ही मैंने खराशें क़ुबूल की 
काँटों से जब गुलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए 
तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

अंगड़ाईयों को आपकी मोहताज है नज़र 
सोया हुआ शबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

दर्दों की इंतिहा से गुज़र के जेहन में जब 
जज्बों का इन्किलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

तारे समेटने के लिए शोख़ फ़लक से 
धरती से माहताब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

ठहरी है ग़म की झील में आँखें नदीश की 
यादों का इक हुबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं
चित्र साभार- गूगल

अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली




दूर हमने यूँ तीरगी कर ली
जला के दिल को रौशनी कर ली

दोस्ती है फ़रेब जान के ये
जो मिला उससे दुश्मनी कर ली

ज़िन्दगी कैसे रहबरी करती

मौत ने मेरी रहज़नी कर ली

इसलिए हो गए खफ़ा आंसू

सिर्फ उम्मीद-ए-ख़ुशी कर ली


गिर गए आईने की आँखों से
अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली

रूठ के जाना किसी का ऐ नदीश

रूह ने जैसे बेरुख़ी कर ली



चित्र साभार-गूगल

मंज़र दिल का उदास

मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता
तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता

तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई
लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता

जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको
बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता

जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में
ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता

ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब
सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता
चित्र साभार- गूगल

बुझी आँखों में


वफ़ा का फिर सिला धोखा रहा है
बस अपना तो यही किस्सा रहा है



उन्ही जालों में खुद ही फंस गया अब
जिन्हें रिश्तों से दिल बुनता रहा है



समेटूं  जीस्त के सपने नज़र में
मेरा अस्तित्व तो बिखरा रहा है



बुझी आँखों में जुगनू टिमटिमाये
कोई भूला हुआ याद आ रहा है



ख्यालों में तेरे खोया है इतना 
नदीश हर भीड़ में तनहा रहा है
चित्र साभार- गूगल

तुम्हारी यादों से .

पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं
लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं

जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं

फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं

फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो
जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं

.
जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की
हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल

चांदनी की तरह

प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह

आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह