चांदनी की तरह

प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह

आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह

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24 Comments

  1. वाह्ह्ह...बहुत खूब,लाज़वाब गज़ल लोकेश जी।अनकहे जज़्बातों को लफ़्ज़ दे दिया ।

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  2. बेहतरीन गजल।
    निरंतर प्रवाह के साथ।

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  3. वाह्ह्ह !बहुत खूब

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  4. बहुत ख़ूब ...
    इंसान है तो मिलें इंसान जैसे ही ...
    लाजवाब शेर हैं ग़ज़ल के ...

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  5. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 24 जून 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
    फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह
    बेहतरीन रचना

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  7. वाह!!!
    लाजवाब गजल...

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