ग़म की झील में


रुख़ से ज़रा नक़ाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
महफ़िल में इज़्तिराब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

इस आस में ही मैंने खराशें क़ुबूल की 
काँटों से जब गुलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए 
तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

अंगड़ाईयों को आपकी मोहताज है नज़र 
सोया हुआ शबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

दर्दों की इंतिहा से गुज़र के जेहन में जब 
जज्बों का इन्किलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

तारे समेटने के लिए शोख़ फ़लक से 
धरती से माहताब उठे तो ग़ज़ल कहूं 

ठहरी है ग़म की झील में आँखें नदीश की 
यादों का इक हुबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं
चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. वाह्ह्ह....शानदार गज़ल...बहुत ही लाज़वाब लोकेश जी।

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  2. छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए
    तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूं ...
    क्या अंदाज़ है ग़ज़ल कहने का ... बहुत खूब ...

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  3. दो लाइने मेरी भी...

    मजा आ गया पढकर, नशे में हूँ,
    मुझको होश आ जाए तो कुछ कह सकूँ

    वाह।। वाह शानदार गजल...नदीश जी

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  4. हमेशा की तरह लाज़वाब

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  5. वाह बेहतरीन उम्दा।

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