ख़ुदकुशी कर ली




दूर हमने यूँ तीरगी कर ली
जला के दिल को रौशनी कर ली

दोस्ती है फ़रेब जान के ये
जो मिला उससे दुश्मनी कर ली

ज़िन्दगी कैसे रहबरी करती

मौत ने मेरी रहज़नी कर ली

इसलिए हो गए खफ़ा आंसू

सिर्फ उम्मीद-ए-ख़ुशी कर ली


गिर गए आईने की आँखों से
अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली

रूठ के जाना किसी का ऐ नदीश

रूह ने जैसे बेरुख़ी कर ली



चित्र साभार-गूगल

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12 Comments

  1. बहुत ही सुंदर है गज़ल ।

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  2. वाह !! क्या खूब लिखा ?

    गिर गए आईने की आँखों से
    अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली-- अति सुंदर !!!!! आखिरी शेर भी कबिलेदाद है आदरणीय लोकेश जी |

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  3. वाह्ह...शानदार..लाज़वाब गज़ल लोकेश जी👌

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  4. बहुत ख़ूब ...
    लाजवाब शेर हैं ग़ज़ल में ...

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  5. आदरणीय लोकेश जी ------- हमेशा की तरह खूबसूरत अशार!!!!!!!!!!ये शेर मुझे खास काबिले दाद लगा -
    दोस्ती है फ़रेब जान के ये
    जो मिला उससे दुश्मनी कर ली------------ सादर आभार |

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  6. Jabardast.......Shandaar gazal

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