निचोड़ के मेरी पलक को


अपने होने के हर एक सच से मुकरना है अभी
ज़िन्दगी है तो कई रंग से मरना है अभी

तेरे आने से सुकूं मिल तो गया है लेकिन
सामने बैठ ज़रा मुझको संवरना है अभी

ज़ख्म छेड़ेंगे मेरे बारहा पुर्सिश वाले
ज़ख्म की हद से अधिक दर्द उभरना है अभी

निचोड़ के मेरी पलक को दर्द कहता है
मकीन-ए-दिल हूँ मैं और दिल में उतरना है अभी

आज उसने किया है फिर से वफ़ा का वादा
इम्तिहानों से मुझे और गुजरना है अभी

बाद मुद्दत के मिले तुम तो मुझे याद आया 
ज़ख्म ऐसे हैं कई जिनको कि भरना है अभी

हुआ है ख़त्म जहाँ पे सफ़र नदीश तेरा 
वो गाँव दर्द का है और ठहरना है अभी

चित्र साभार- गूगल 

बारहा- बार-बार
पुर्सिश- हालचाल जानना
मकीन-ए-दिल- दिल का निवासी


टिप्पणियां

  1. आदरणीया /आदरणीय, अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है आपको यह अवगत कराते हुए कि सोमवार ०६ नवंबर २०१७ को हम बालकवियों की रचनायें "पांच लिंकों का आनन्द" में लिंक कर रहें हैं। जिन्हें आपके स्नेह,प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन की विशेष आवश्यकता है। अतः आप सभी गणमान्य पाठक व रचनाकारों का हृदय से स्वागत है। आपकी प्रतिक्रिया इन उभरते हुए बालकवियों के लिए बहुमूल्य होगी। .............. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"



    जवाब देंहटाएं
  2. वाह बहुत ही उम्दा ग़ज़ल .....

    जवाब देंहटाएं
  3. अपने होने के हर एक सच से मुकरना है अभी
    ज़िन्दगी है तो कई रंग से मरना है अभी....
    दर्द के अहसास से सराबोर !

    जवाब देंहटाएं
  4. निचोड़ के मेरी पलक को दर्द कहता है
    मकीन-ए-दिल हूँ मैं और दिल में उतरना है अभी

    लाजवाब गजल नदीश जी👌👌👌

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत उम्दा लोकेश जी,
    आपकी हर गजल गहरी और भाव लिये होती है ।
    बेहतरीन।

    जवाब देंहटाएं
  6. बेहतरीन ...., लाजवाब ग़ज़ल ।

    जवाब देंहटाएं
  7. ज़िन्दगी के कई इम्तिहान ऐसे होते हैं...
    लाजवाब ग़ज़ल ...

    जवाब देंहटाएं

टिप्पणी पोस्ट करें