ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव

जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच
होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 

अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच

सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा की आँच 

सौदागरी नहीं है, ये है ज़िंदगी मेरी 
रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 

महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं 
लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच


दरिया ये कोई आग का आई है करके पार
पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को
इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच


चित्र साभार-गूगल

10 comments:

  1. दरिया ये कोई आग का आई है करके पार
    पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच
    वाह लोकेश जी.....

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  2. वाह्ह्ह...बहुत शानदार ग़ज़ल लोकेश जी।

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  3. शब्दों का चयन आपसे सीखना पडेगा, हर शब्द बहुत कुछ अभिव्यक्त कर रहा है। बेहतरीन गजल लोकेश जी।

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