ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव



फैसलों का तेरे ऐ ज़िन्दगी हिसाब रखता हूँ।
गुज़िश्ता हर लम्हें की तेरे इक किताब रखता हूँ

देखकर चुप हूँ तेरी चश्मे-परेशां ऐ वक़्त
वगरना तेरे हर सवाल का जवाब रखता हूँ

दोस्ती में सुना है अब कहीं वफ़ा ही नहीं
बात ये है कि मैं भी थोड़े से अहबाब रखता हूँ

 उम्मीदो-अश्क़ से बावस्ता हैं आँखें उससे
शिकस्ता ही सही वफ़ा का मैं जो ख़्वाब रखता हूँ

कोई ख़्वाहिश कोई हसरत नहीं खुशी की नदीश
उतर के देख दिल में कितने मैं अज़ाब रखता हूँ

चित्र साभार-गूगल

16 comments:

  1. दिल से लिखी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हर शेर लाज़वाब है लोकेश जी।

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    1. बहुत आभार श्वेता जी

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  2. बहुत ही ख़ूबसूरत शेर हैं ग़ज़ल के ...

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  3. बहुत ही खूबसूरत गजल, लोकेश जी।

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  4. बहुत सुंदर शेर एक से एक,
    बेहतरीन गजल।

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  5. बेहतरीन, बार बार पढ़ती हूँ आपकी ग़ज़लें आदरणीय

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    1. ज़र्रा नवाज़ी है आपकी
      बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  6. Replies
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  7. बहुत खूब 👌👌👌

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  8. उम्मीदो-अश्क़ से बावस्ता हैं आँखें उससे
    शिकस्ता ही सही वफ़ा का मैं जो ख़्वाब रखता हूँ

    कोई ख़्वाहिश कोई हसरत नहीं खुशी की नदीश
    उतर के देख दिल में कितने मैं अज़ाब रखता हूँ...


    बेहतरीन गजल नदीश जी।

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