ग़ज़ल की शबनमी छाँव में एक ठहराव...



झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल
खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल 

भटके न  राहगीर  कोई  राह  प्यर   की
रक्खें हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल 

दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया
झरने लगे हैं  आँख से भी   चांदनी के फूल 

बोएंगे मुसलसल जो सभी दुश्मनी के बीज
देखेगी कैसे नस्ल कल की दोस्ती के फूल 

हस्ती को अपनी पहले मुकम्मल तो कीजिये
खिलते हैं बहुत मुश्किलों से आदमी के फूल 

अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम
हर सांस महकती है लिए बन्दिगी के फूल 

है तसफिये कि ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात
खिलते हैं  दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल 

छूकर गुले-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी
होंठो  पे गुनगुना  रहे   हैं शायरी के फूल 

भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी नदीश
अशआर तेरे आये हैं  लेके  सदी के फूल
चित्र साभार-गूगल

14 comments:

  1. वाह्ह्ह...वाह्ह्ह..बेहद खूबसूरत लाज़वाब ग़ज़ल लोकेश जी...👌👌

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  2. बहुत बेहतरीन रचना

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  3. बुत लाजवाब शेर हैं इस ग़ज़ल के ... गहरा एहसास लिए ...

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  4. Replies
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय

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  5. फॉलोबर्स का गैजेट लगाइए अपने ब्लॉग पर। जिससे कि हम फॉलो करें और हमारे डैशबोर्ड पर आपकी फीड आती रहे।

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  6. बहुत बढ़िया ग़ज़ल, लोकेश जी।

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  7. बहुत खूबसूरत.... बहुत लाजवाब....
    वाह!!!

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