सरापा दास्तां हूँ

यहां पर भी हूँ मैं, मैं ही वहां हूँ
ठिकाना है बदन, मैं लामकां हूँ

हमारा साथ है कुछ इस तरह से
तड़प और दर्द तू है, मैं फुगां हूँ

हुई है ग़म से निस्बत जब से मेरी
है सच, न ग़मज़दा हूँ न शादमां हूँ

मुझे पढ़ लो मुझे महसूस कर लो
मैं अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में निहां हूँ

न है उन्वान, न ही हाशिया है
मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ

नदीश आओ ज़माना मुझमें देखो
मैं नस्ल-ए-नौ की मंज़िल का निशां हूँ

चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. वाह शानदार!!!
    नस्ल ए नौ की मंजिल का निशां हूं।
    बेहतरीन उम्दा।

    ReplyDelete
  2. सुंदर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  3. गज़ल तो हमेशा की तरह लाज़वाब है लोकेश जी....पर कुछ शब्दों के अर्थ समझ नहीं पाये हम।😢

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया
      शब्दों के अर्थ बता दूंगा

      Delete
  4. बहुत खूब ...
    गज़ब की ग़ज़ल ... बहुत से नए शदों के साथ कमल के शेर ...

    ReplyDelete
  5. शानदार.......
    नस्ल-ए-नौ.....? का अर्थ बताएं आदरणीय

    ReplyDelete
    Replies
    1. नई पीढ़ी, वंशज।
      बेहद शुक्रिया

      Delete

Post a Comment