ग़ज़ल की शबनमी छाँव में एक ठहराव...


पलक की सीपियों में अश्क़ को गौहर बनाता हूँ
मैं तन्हाई की दुल्हन के लिए जेवर बनाता हूँ

कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस की पंखुडियां 
तेरे वादों को मैं तस्वीर में अक्सर बनाता हूँ

मेरी मंज़िल की राहों में खड़ा है आसमां तू क्यूँ
ज़रा हट जा मैं अपने हौसले को पर बनाता हूँ

ज़ेहन में चहचहातें हैं तुम्हारी याद के पंछी
मैं जब भी सोच में कोई हसीं मंज़र बनाता हूँ
चित्र साभार- गूगल

13 comments:

  1. जेहन में चहचहाते हैं तुम्हारी याद के पंछी ....
    वाह ... लाजवाब शेर है इस ग़ज़ल का ... सीधे मन में उतरता है ...

    ReplyDelete
  2. आदरनीय लोकेश जी -- हमेशा की तरह आज की रचना का भी हर शेर एक नयी पहचान रखता है और मन को छू लेने वाला है | सभी शेर मुझे बहुत अच्छे लगे | नितांत नयी तरह के शेर हैं और अछूते भाव हैं | हार्दिक बधाई आपको |

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

      Delete
  3. मेरी मंज़िल की राहों में खड़ा है आसमां तू क्यूँ
    ज़रा हट जा मैं अपने हौसले को पर बनाता हूँ
    गजब लिखा

    ReplyDelete
  4. उम्दा रचना हर बार की तरह अपने वीधा मे आपखा पूरण अधिकार है ।

    ReplyDelete
  5. वाह बेहतरीन उन्वान ..👌👌👌👌
    हर शेर अपने आप में मुकम्मल ....

    ReplyDelete