ख़ुश्बू आँखों में


ख़्वाब तेरा करता है वो जादू आँखों में
भर उठती है ख़्वाब की हर ख़ुश्बू आँखों में

क़त्ल बताओ कैसे फिर मेरा न होता
रक्खे थे उसने लम्बे चाकू आँखो में

मचल मचल जाती है ये दीदार को तेरे
अब हमको भी रहा नहीं काबू आँखों में

दर्द कोई जब दिल को मेरे छेड़े आकर
जोर से हँसते हैं मेरे आंसू आँखों में

ऐ नदीश जिसपे भी किया भरोसा तूने
चला गया है झोंक के वो बालू आँखों में

चित्र साभार- गूगल

10 comments:

  1. वाह्ह्ह...जानदार,शानदार गज़ल.लोकेश जी।👌

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    1. बहुत बहुत आभार श्वेता जी

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया

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  3. लाजवाब शेर हैं इस ग़ज़ल के ... बहुत खूब ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया

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