रिश्तों की ये पतंग

तिल गुड़ की खुश्बू सोंधी ये ख़ास खो न जाये
पुरखों की जो विरासत है पास, खो न जाये

उलझे न साज़िशों में रिश्तों की ये पतंग
अपनों को गिराने में एहसास खो न जाये

मेले ख़ुशी के जितने भी आएं ज़िन्दगी में
पर दुख में याद रखना कि आस खो न जाये

सुख की पतंग उलझे गर दुख की मुंडेरों पे
छूटे न डोर मन की विश्वास खो न जाये

मिलजुल के आज सोचें आओ नदीश हम सब
दुनिया से मुहब्बत की ये प्यास खो न जाये

चित्र साभार- गूगल

टिप्पणियां

  1. उलझे न साज़िशों में रिश्तों की ये पतंग
    अपनों को गिराने में एहसास खो न जाये..
    सुंदर एहसास लिए मोहक रचना....

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  2. उमीदों की डोर बंधी रहे ... आशा वोश्वास से भरे शेर ... लाजवाब ...

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  3. आशा का संचार करती बहुत सुंदर रचना।

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  4. यह डोर तो साहित्यकारों के हाथ में है, समाज को चाहे जिधर ले जाएँ ..
    खूबसूरत एहसासों से भरी रचना

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