मेरे एहसास की तितली


लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं

ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. अपने जी ख़ंजर मार देते हैं ...
    ग़ज़ब का शेर .. बाक़ी भी लाजवाब शेर हैं इस ग़ज़ल के ...

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  2. वाह्ह्ह...लाज़वाब👌👌👌
    हर शेर नायाब है अपने आप में।

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  3. बहुत उम्दा वाह गजल।

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  4. आपकी लिखी रचना सोमवारीय विषय विशेषांक "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 29 जनवरी 2018 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. बहुत सुंदर मनमोहक रचना
    बहुत बहुत बधाई

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  6. वाह.. अप्रतिम शब्द..

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  7. लाजवाब गजल....
    वाह!!!

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  8. कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
    मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं------
    वाह !! आदरणीय लोकेश जी -- अप्रितम शेर !!!!!!

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  9. अप्रतिम रचना, यह शेर बहुत सुंदर लगा-
    ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
    पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं ...

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  10. बहुत लाजबाब प्रस्तुति।

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