तहखाने नींद के

ये तेरी जुस्तजू से मुझे तज़ुर्बा हुआ
मंज़िल हुई मेरी न मेरा रास्ता हुआ

खुशियों को कहीं भी न कभी रास आऊँ मैं
हाँ सल्तनत में दर्द की ये फैसला हुआ

मिट ना सकेगा ये किसी सूरत भी अब कभी
नज़दीकियों के दरम्यान जो फासला हुआ

जब से खँगालने चले तहखाने नींद के
अश्क़ों की बगावत में ख़्वाब था डरा हुआ

अक्सर ये सोचता हूँ क्या है मेरा वज़ूद
मैं एक अजनबी से बदन में पड़ा हुआ

थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए
कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ

है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ

मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ

अब थम गया नदीश तेरी ख़िल्वतों का शोर
हाँ मिल गया है दर्द कोई बोलता हुआ

चित्र साभार- गूगल

Comments

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९फरवरी २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. बहुत सुंदर रचना। लाज़वाब

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  4. बेहद सुंदर रचना

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  5. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 13 दिसम्बर 2018 को प्रकाशनार्थ 1245 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

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    सधन्यवाद।

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  6. वाह ... गज़ब ...
    हर शेर कमाल का है ... खूबसूरत ग़ज़ल ...

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  7. बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल

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  8. लाजबाब !! वाह , वाह....

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  9. वाह!!!
    कमाल की गजल...
    बहुत लाजवाब

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  10. लाजवाब...., बेहतरीन सृजन ।

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  11. है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
    मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ
    वाह वाह बहुत ख़ूब

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