ख़्वाबों को

तूफ़ान में कश्ती को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्दे-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों मे कोई और नज़ारा नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो साथ तेरे हमने गुज़ारा नहीं होता

चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/03/62.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. बेहद शुक्रिया आदरणीय

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  2. "मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
    ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता"
    बहुत खूब......, बहुत खूबसूरत गज़ल .

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  3. तूफ़ान में कश्ती को उतारा नहीं होता
    उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता
    खूबसूरत गजल !

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना गुरुवार २९ मार्च २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
    आँखों मे कोई और नज़ारा नहीं होता

    ....वाह...बहुत उम्दा

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  6. बहुत खूब ...
    जब उनका अक्स आ जाये तो किसी और को देखने की चाहत भी कहाँ ..
    लाजवाब शेर हैं सभी इस ग़ज़ल के ....

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  7. बहुत सुन्दर
    बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए

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  8. वाह वाह बेहद खूबसूरत सर
    हमें भी ग़ज़ल लिखना सिखा दीजिये

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    1. बहुत बहुत आभार
      जी जरूर ,

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