काफ़िले दर्द के


जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं 
काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं

तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी 
अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं

किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो
अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं

इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से
रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं

देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं

बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं

खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा
उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं

बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश
रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं

चित्र साभार-गूगल

10 comments:

  1. बहुत ख़ूब ... khizan को कहाँ ये अहसास होता है ... पत्तों पे गुज़रती है ...
    हर शेर लाजवाब ग़ज़ल का ...

    ReplyDelete
  2. हर शेर बेहद उम्दा है..लाज़वाब गज़ल
    लोकेश जी...वाह्ह्ह...👌👌

    ReplyDelete
  3. लोकेश जी आपकी शेर ओ शायरी और गजल नज्म का कोई जवाब नही
    बेमिसाल।

    ReplyDelete
  4. आदरणीय लोकेश जी -- आपके शेर ताजगी भरे और बेहद उम्दा होते हैं |जब भी
    आपके ब्लॉग पर आई हूँ कुछ ना कुछ नया अप्रितम मिलता है | सहज ही मन को छु लेते हैं सब अशार
    दर्द के अहसासात को मुखर करते शब्द बेमिसाल है ------------
    देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
    अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं
    बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
    ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं------
    अति सुंदर !!!!!!!!!!!!!! सादर -

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

      Delete
  5. तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी
    अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं बहुत उम्दा गजल

    ReplyDelete