ग़ज़ल की शबनमी छाँव में एक ठहराव...

बनकर तेरी यादों की ख़ुश्बू आये हैं
दर्द के कुछ कस्तूरी आहू आये हैं

भेजा है पैग़ाम तुम्हारे ख़्वाबों ने
बनकर क़ासिद आँख में आंसू आये हैं

रात अमावस की औ' यादों की टिमटिम
ज्यों राहत के चंचल जुगनू आये हैं

महका-महका हर क़तरा है मेरे तन का
हम जब से तेरा दामन छू आये हैं

जब भी बादल काले-काले दिखे नदीश
ज़हन में बस तेरे ही गेसू आये हैं

चित्र साभार- गूगल

आहू- मृग, हिरण
क़ासिद- पत्रवाहक, डाकिया
गेसू- ज़ुल्फ़, बाल

10 comments:

  1. वाह! बहुत खूब!!!

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  2. २ शेर बहुत उम्दा

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  3. हर शेर लाजवाब ।
    उम्दा गजल ।

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  4. --- वाह !!!! आदरणीय लोकेश जी बहुत ही लाजवाब शेर पर ये शेर मुझे खास लगा |--
    जा है पैग़ाम तुम्हारे ख़्वाबों ने
    बनकर क़ासिद आँख में आंसू आये हैं

    आपके भावपूर्ण लेखन की मुरीद हूँ | सादर शुभकामना |

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