रस्ते तो ज़िन्दगी के साज़गार बहुत थे
खुशियों को मगर हम ही नागवार बहुत थे

बिखरे हुए थे चार सू मंज़र बहार के
बिन तेरे यूँ लगा वो सोगवार बहुत थे

ये जान के भी अहले-जहां में वफ़ा नहीं
दुनिया की मोहब्बत में गिरफ्तार बहुत थे

थी नींद कैद, आंसुओं की ज़द में रात भर
आँखों में चंद ख़्वाब बेक़रार बहुत थे

झुलसे मेरी वफ़ा के पांव आख़िरश नदीश
या रब तेरे यक़ीन में शरार बहुत थे

चित्र साभार- गूगल

साज़गार- अनुकूल
नागवार- अप्रिय
सोगवार- दुखी
सू- दिशा