सपने, आँखें, नींद


समझदार तो सिर्फ़ सियासत करते हैं
पागल हैं जो लोग, मुहब्बत करते हैं

ये तो सोचा नहीं दोस्ती में हमने
आगे चलकर दोस्त अदावत करते हैं

दिल से उसे भुला दें, गर है शर्त यही
सांसों की हम रद्द ज़मानत करते हैं

मिलता है अश्क़ों को देश निकाला जब
सपने, आँखें, नींद बग़ावत करते हैं

कोना तेरी यादों का महफूज़ रखा
इतनी दिल के ज़ख़्म रियायत करते हैं

अपनी तुर्बत से अब चलो नदीश उठो 
मिट्टी से वो रोज़ शिकायत करते हैं

चित्र साभार- गूगल

तुर्बत- कब्र

टिप्पणियां

  1. समझदार तो सिर्फ़ सियासत करते हैं
    पागल हैं जो लोग, मुहब्बत करते हैं

    बहुत ही खूबसूरत मतला। वाह वाह। सारी ग़ज़ल ही एक शाहकार जैसी है।

    जितने गिले हैं सारे मुँह से निकाल डालो
    रखो न दिल में प्यारे मुँह से निकाल डालो।

    जवाब देंहटाएं
  2. सभी शेर लाजवाब आप बहुत उम्दा लिखते है और सलीके से।
    वाह उम्दा सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ४ मई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. मिलता है अश्क़ों को देश निकाला जब
    सपने, आँखें, नींद बग़ावत करते हैं......... वाह! उम्दा अलफ़ाज़!!!

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह वाह क्या बात है ..

    मतला पढ़ते ही समां गजलनुमा हो गया.


    खैर 

    जवाब देंहटाएं
  6. लाजवाब गजल ....हमेशा की तरह...
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  7. मुहब्बत पागल पन है तो क़बूल है ...
    हर शेर कमाल ...

    जवाब देंहटाएं

टिप्पणी पोस्ट करें