शहर में तेरे

मकानों के दरम्यान कोई घर नहीं मिला
शहर में तेरे प्यार का मंज़र नहीं मिला

झुकी जाती है पलकें ख़्वाबों के बोझ से
आँखों को मगर नींद का बिस्तर नहीं मिला

सर पे लगा है जिसके इलज़ाम क़त्ल का
हाथों में उसके कोई भी खंज़र नहीं मिला

किस्तों में जीते जीते टुकड़ों में बंट गए
खुद को समेट लूँ कभी अवसर नहीं मिला

फिरता है दर्द सैकड़ों लेकर यहां नदीश
अपनों की तरह से कोई आकर नहीं मिला

चित्र साभार- गूगल

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20 Comments

  1. लाजवाब रचना 👌

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  2. बहुत सुंदर गजल हर बार की तरह बेमिसाल

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  3. बहुत सुन्दर गजल....
    हमेशा की तरह
    वाह!!!

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  4. लाजवाब गज़ल ।

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  5. ग़ज़ब ...
    आँखों को नींद का मंज़र नहि मिला ... हसीन शेर हैं सभी ...

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  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 02 जुलाई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  7. फिरता है दर्द सैकड़ों लेकर यहां नदीश
    अपनों की तरह से कोई आकर नहीं मिला--
    आदरणीय लोकेश जी हर बार ही आपके अशार सराहना से परे होते हैं |
    जीवन की कडवी सच्चाईयों से रूबरू कराते है सभी अशार | हार्दिक शुभकामनायें |

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