ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव

कड़ी है धूप और न साया-ए-शजर यारों
न हमसफ़र है, उसपे ज़ीस्त का सफ़र यारों

न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों

आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब
लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों

बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम
मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों

मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों

चित्र साभार- गूगल

साया-ए-शजर- पेड़ की छांव
ज़ीस्त- जीवन, ज़िन्दगी
चराग़-ए-अश्क़- आंसू के दीये
दरो-दीवारे-ख़्वाब- ख़्वाब के दरवाजे और दीवार
गुले-एहसास- अनुभूति का फूल
रक़ीब- प्रेम में प्रतिद्वंद्वी
मोतबर- विश्वसनीय, भरोसेमंद
मुद्दत- लंबा अंतराल, काफी समय से

16 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ मई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
    बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों
    आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब
    लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों---
    हमेशा की तरह बेहद शानदार शेरों से सजी रचना आदरणीय लोकेश जी | सादर --

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  3. पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ है.
    और इस रचना को पढ़ कर मैं आपकी लेखनी से बहुत प्रभावित हुआ हूँ.
    बहुत खूबसूरती से लिखी गयी गजल है.
    पढ़ कर मन प्रफुलित हो गया.

    हाथ पकडती है और कहती है ये बाब ना रख (गजल 4)

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  4. मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
    उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों
    बहुत लाजवाब
    वाह!!!!

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  5. बेहतरीन अश्आर नदीश जी हर शेर बेमिसाल ।

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  6. न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
    बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों ...
    बहुत ही ख़ूबसूरत शेर इस ग़ज़ल का ... लाजवाब लिखा है आपने ...

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  7. लाजवाब गज़ल नदीश जी ।

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  8. आपकी रचना में मुझे अपना गुजरा जीवन दिखता है। बस इतना ही कहूंगा "लाजवाब"...

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    1. बात आप तक पहुँची, मेरा लेखन सार्थक हो गया।
      बेहद आभार आदरणीय

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