ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव


दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाये रक्खा
इन चराग़ों को हवाओं से बचाये रक्खा

हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
हमने खुद को तेरी यादों में डुबाये रक्खा

तिरे ख़्याल ने दिन भर मुझे सताया है
हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाये रक्खा

वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन
मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाये रक्खा

उमड़ पड़ा है ये तूफ़ान देखकर तुमको
मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाये रक्खा

रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें
एक-एक हर्फ़ ने अहसास बनाये रक्खा

चित्र साभार- गूगल

*हर्फ़- अक्षर

20 comments:

  1. वाह्ह...गज़ब के शेर हैं...लाज़वाब..शानदार👌👌👌

    हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
    हमने खुद को तेरी यादों में डुबाये रक्खा
    क्या कहने बहुत अच्छा लगा ये खासकर..।

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  2. आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ मई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. बेहतरीन लोकेश जी..

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  4. रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें
    एक-एक हर्फ़ ने अहसास बनाये रक्खा......सच कहूँ नदीश जी तो आपकी ग़ज़लों पर मेरी प्रतिक्रया के लिए अलफ़ाज़ भी आप ने ही तलाश लिए! मुबारक और शुक्रिया!!!!

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  5. तिरे ख़्याल ने दिन भर मुझे सताया है
    हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाये रक्खा-----
    आदरणीय लोकेश जी --- हर बार आपकी रचनाओं में नया कुछ पा मन को बहुत ख़ुशी मिलता है | सादर --

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  6. वाह बहुत खूबसूरत गजल

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  7. बहुत लाजवाब ग़ज़ल ...
    हट शेर नायाब ... महीने सा खिलता हुआ ...

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