ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव

रखता नहीं है निस्बतें  किसी  से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा, फ़रेब,  खून-ए-वफ़ा  रस्म हो गए
डरने लगा  है अब  तो  दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से  इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश  भी  नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

हासिल है रंजिशों का तबाही-ओ-तबाही
रहता है मगर फिर भी दुश्मनी से आदमी

अपना पराया भूल के सब एक हो यहां
अच्छा है कि मिल के रहे सभी से आदमी

अच्छा है कि नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पाता है कुछ नया किसी कमी सी आदमी

चित्र साभार- गूगल

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निस्बत- अपनापन
आजिज़ी- बेमन, बेरुख़ी
मुकम्मल- पूर्ण

14 comments:

  1. वाह्ह्ह...बेहद शानदार गज़ल लोकेश जी।
    हर शेर बेहद.उम्दा है👌👌

    आदमी की फितरत है ऐसे कैसे बदलेगी
    दिखाओ न आईना असलियत देखकर बिगड़ेगी

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  2. बहुत ही सुंदर शायरी। मैं तो चाहकर भी ऐसा नही लिख पाऊंगा। बधाई

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    1. आप भी बेहतर लिखते हैं आदरणीय
      बहुत धन्यवाद

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  3. बेहतरीन ग़ज़ल.....,


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  4. धोखा, फ़रेब, खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए
    डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी--------बहुत खूब रचना आदरणीय लोकेश जी | सुप्रभात व शुभकामनायें |

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  5. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 7 जून 2018 को प्रकाशनार्थ 1056 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

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    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  6. बहुत ही शानदार।

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  7. बहुत ख़ूब ...
    डरने लगा है दोस्ती से आदमी ...
    हर शेर लाजवाब है और पूरी ग़ज़ल तो कमाल की ...

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