ग़ज़ल की शबनमी छाँव में एक ठहराव...

अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे
मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे

मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे
चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे

दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं
दर्द कोई नया ज़िगर से गुज़र जाने दे

यूँ नहीं होता है इसरार से हमराह कोई
गुज़र जायेगा तन्हा ये सफ़र जाने दे

नदीश आयेगा कभी तो हमसफ़र तेरा
जहां भी जाये मुंतज़िर ये नज़र जाने दे

चित्र साभार- गूगल

इसरार- आग्रह
मुंतज़िर- प्रतीक्षारत

12 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. बहुत ख़ूब ...
    लाजवाब शेर ग़ज़ल के ...

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  3. बहुत ही प्यारे और गुनगनाने लायक शेर

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  4. ख़ूबसूरत... बेहतरीन... हरेक शेर उम्दा👌👌👌👏👏👏

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  5. वाह बहुत सुंदर गजल

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