ज़िन्दगी

सैकड़ों खानों में जैसे बंट गई है ज़िन्दगी
साथ रह कर भी लगे है अजनबी है ज़िन्दगी

झाँकता हूँ आईने में जब भी मैं अहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी

न तो मिलने की ख़ुशी है न बिछड़ जाने का ग़म
हाय, ये किस मोड़ पे आकर रुकी है ज़िन्दगी

सीख ले अब लम्हें-लम्हें को ही जीने का हुनर
कौन जाने और अब कितनी बची है ज़िन्दगी

आख़िरी है वक़्त कि अब तो चले आओ सनम
बस तुम्हें ही देखने तरसी हुई है ज़िन्दगी

वस्ल भी है प्यार भी है प्यास भी है जाम भी
फिर भी जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

अब कहाँ तन्हाई ओ' तन्हाई का साया नदीश
उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी

चित्र साभार- गूगल

10 comments:

  1. जहाँ सब अपने हों ... ख़ुशी ग़म न हो वही तो असल ज़िंदगी है .... बहुत ही कमाल के शेर इस ग़ज़ल के ... ज़िंदाबाद ...

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  2. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/06/75.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  3. हर बार की तरह लाजवाब हर शेर उम्दा ।

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  4. बेहतरीन रचना

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  5. अब कहाँ तन्हाई ओ' तन्हाई का साया नदीश
    उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी.... वाह बहुत सुंदर

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    1. बहुत बहुत आभार आपका

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