ग़ज़ल की शबनमी छांव में एक ठहराव

बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा
लिपट के रास्ते से मेरे तर-ब-तर निकला

खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू
मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला

रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को 
उसके तहखाने से कटा हुआ शजर निकला

हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे
दर्द का एक पल जो ख़ुशियों से बेहतर निकला

चित्र साभार- गूगल

12 comments:

  1. क्या कहें लोकेश जी..दर्द का कोई राग छेड़ दिया हो मानो...बेहद उम्दा ग़ज़ल..हर शेर मन छू गया..👌👌
    बधाई स्वीकार करें..।

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    1. बेहद शुक्रिया श्वेता जी

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविववार 10 जून 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू
    मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला......वाह! क्या खूब बयान किया आपने मन के तरानों को!!!!

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  4. क्या खूब उम्दा बानगी।

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  5. बेहतरीन लोकेश जी...

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  6. बहुत ख़ूब ...
    कटे हुए शजर का दर्द ही शायद उसे दाने बाँटने को मजबूर कर रहा है ...
    लाजवाब ग़ज़ल के कामयाब शेर ... बहुत ख़ूब ...

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