तेरे बगैर

किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफ़ा सा, खैर रहा है

हासिल यही है तज़ुर्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
किरदार तो अपनों में मेरा ग़ैर रहा है

मुझको बहुत अज़ीज़, फ़क़ीरी है मेरी
हाँ गुम्बदों के सर पे मेरा पैर रहा है

फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र
बनके लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे नदीश ये तेरे बगैर रहा है

चित्र साभार- गूगल

बार-ए-अना- अहंकार का बोझ

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18 Comments

  1. वाह्हह... जबरदस्त...👌👌
    लोकेश जी बेहद शानदार गज़ल।

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  2. बहुत शानदार हर शेर उम्दा🙏🙏❤

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  3. शानदार रचना लोकेश जी

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  4. आदरणीय लोकेश जी ---शानदार रचना !!!!!जीवन के
    शाश्वत क्रूर सत्य को उकेरता ये शेर क्या खूब और काबिले दाद है !!!!!!

    फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र
    बनके लाश जो पानी में तैर रहा है-- वाह और सिर्फ वाह !!!!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया
      आपके उत्साहवर्धक शब्द बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं

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  5. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/07/77.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय

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  6. वाह बहुत उम्दा रचना ।

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  7. बहुत ही सुंदर रचना, नदीश जी।

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  8. अलग अंदाज के अशआर, अच्छी ग़ज़ल

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