तेरा ख़याल

याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं

तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं

इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
 

चित्र साभार- गूगल

26 comments:

  1. उनके ख़्वाब आँखों में नमी बन के उतर आते हैं ..
    लाजवाब शेर ग़ज़ल के ...

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  2. वाह वाह उम्दा लोकेश जी

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  3. बहुत उम्दा ख्वाब दर्द समेटे ।

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 05 अगस्त 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय

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  5. वाह्ह्हह....बेहद लाज़लाब...हमेना की तरह एक हृदयस्पर्शी ग़ज़ल.. लोकेश जी..बहुत अच्छी लगी👌

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  6. वाह, बेहतरीन लिखा है आपने

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    1. बहुत बहुत आभार आपका

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  7. सुन्दर रचना

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