ग़म की रेत पे

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है
आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है

ख़ुद को अलग करोगे कैसे दर्द से, बोलो
दाग़, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है

अश्क़ सरापा* ख़्वाब मेरे, कहते हैं मुझसे
ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है

मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है
फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है

पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है

वज़्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं
मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है

इतनी यादों की दौलत हो गई इकट्ठी
अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है 


चित्र साभार- गूगल 

*सरापा- सर से पाँव तक

टिप्पणियां

  1. वाह्ह्ह....वाह्ह्ह...गज़ब भाव और बेहद खूबसूरत एहसास से भरी गज़ल है लोकेश जी...शानदार👌👌👌

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  2. खूबसूरत भावों से भरी बेहतरीन गजल

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  3. सच है ज़ख़्म भर जते हैं पर दर्द रह जाता है ...
    हर शेर बहुत कमाल की बात रखता हुआ ... शानदार ग़ज़ल ...

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  4. अश्क़ सरापा ख़्वाब मेरे, कहते हैं मुझसे
    ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है।

    वाह वाह बहुत ख़ूब नदीश साहेब।

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  5. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 26 अगस्त 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
    कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है।
    वाह लाजवाब भावों की उम्दा गजल ।

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  7. पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
    कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है


    Waaah. बहुत ही शानदार linesलिखी हैं।आनंद आ गया।आभार।

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  8. पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
    कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है

    वज़्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं
    मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है

    इतनी यादों की दौलत हो गई इकट्ठी
    अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है
    .
    वाह वाह क्या ग़ज़ल है आदरणीय... बेहद हृदयस्पर्शी... बहुत ख़ूब

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