मेरी आँखों को

ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम
मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें

ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी
रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें

तेरी ख़ुश्बू से महकता है प्यार का गुलशन
सींच के अश्क़, बीज याद के बोई आँखें

हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ
मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें

चित्र साभार- गूगल

18 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक २७ अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया

      Delete
  2. बहुत ही उम्दा ग़ज़ल ।

    ReplyDelete
  3. वाह
    शानदार लिखा हैं.

    ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
    हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

    ReplyDelete
  4. बहुत बहुत सुंदर लोकेश जी!
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  5. अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  6. बेहतरीन रचना
    बधाई आपको

    ReplyDelete
  7. हार्दिक आभार आपका

    ReplyDelete