ये आलम उदास है

तुम बिन बहार का मौसम उदास है।
आकर तो देखो ये आलम उदास है।।

खिलने से पहले ही मसले हैं गुंचे 
मंज़र ये देखकर शबनम उदास है।।

आराम आये भी तो कैसे आये
ज़ख्मों की शिद्दत से मरहम उदास है।।

बीमारे-उल्फ़त हैं कितने न पूछो
कोई ज़ियादा कोई कम उदास है।।

आके किसी रोज देखो नदीश को
जब से गये हो तुम हरदम उदास है।।

चित्र साभार-गूगल