ये आलम उदास है

तुम बिन बहार का मौसम उदास है।
आकर तो देखो ये आलम उदास है।।

खिलने से पहले ही मसले हैं गुंचे 
मंज़र ये देखकर शबनम उदास है।।

आराम आये भी तो कैसे आये
ज़ख्मों की शिद्दत से मरहम उदास है।।

बीमारे-उल्फ़त हैं कितने न पूछो
कोई ज़ियादा कोई कम उदास है।।

आके किसी रोज देखो नदीश को
जब से गये हो तुम हरदम उदास है।।

चित्र साभार-गूगल

18 comments:

  1. तुम बिन बहार का मौसम उदास है।
    आकर तो देखो ये आलम उदास है।।
    बहुत खूबसूरत......, लाजवाब सृजन ।

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  2. वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब...

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 03 फरवरी 2019 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  4. बेहतरीन ग़ज़ल

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  5. वाह !! बहुत ख़ूब 👌👌👌
    सादर

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  6. बीमारे-उल्फ़त हैं कितने न पूछो
    कोई ज़ियादा कोई कम उदास है।।
    बहुत खूब ..............

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  7. आराम आये भी तो कैसे आये
    ज़ख्मों की शिद्दत से मरहम उदास है

    अन्तस् की मखमली . महीन अनुभूतियों को बहुत ही कोमलता से उकेरती रचना बहुत प्यारी है आदरणीय लोकेश जी | आपके लेखन की मौलिक शैली को संजोये ये रचना आपकी एनी रचनाओं की तरह वाह और सिर्फ वाहकी हक़दार है | हार्दिक शुभकामनायें और बधाई |

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  8. बहुत खूब ...
    मकते का शेर तो लाजवाब है ...
    हर शेरर खूबसूरत है इस ग़ज़ल का ...

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  9. भावपूर्ण रचना

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  10. बहुत सुंदर प्रस्तुति।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

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  11. वाह क्या बात है

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