जो मेरा था




चला शहर को तो वो गांव बेच आया है
अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है
मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने
शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है

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जो मेरा था तलाश हो गया
हाँ यक़ीन था काश हो गया
मेरी आँखों में चहकता था
परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया

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किनारों से बहुत रूठा हुआ है
कलेजा नाव का सहमा हुआ है
पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
समंदर दर्द में डूबा हुआ है

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चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. बहुत लाजवाब मुक्तक ...
    दिल से दाद क़ुबूल करें ... लाजवाब ...

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  2. बहुत बढ़िया मुक्तक, लोकेश जी।

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  3. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति

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  4. लाजवाब बस लाजवाब।
    मेरी आँखों में चहकता था
    परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया।
    अप्रतिम।

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  5. लाजवाब मुक्तक ।

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  6. वाहह्हह.. वाहह्हह.. शानदार.. हृदयस्पर्शी सृजन लोकेश जी👍👍

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  7. किनारों से बहुत रूठा हुआ है
    कलेजा नाव का सहमा हुआ है
    पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
    समंदर दर्द में डूबा हुआ है
    आदरणीय लोकेश जी -- आपकी नर्म मुलायन शायरी के लिए एक ही शब्द है -- वाह !!!! शुभकामनायें स्वीकार हों आदरणीय कविवर |

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  8. बहुत सुन्दर
    सादर

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