हर घड़ी

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से

आँगन तेरी आँखों का न हो जाये कहीं तर
डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से

साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा
दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से

नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी
इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से

कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह
हर लम्हां गुज़रता है नये इम्तिहान से

चित्र साभार- गूगल

टिप्पणियां

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-08-2019) को "बप्पा इस बार" (चर्चा अंक- 3447) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    श्री गणेश चतुर्थी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 02 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
    फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से
    लाजवाब गजल हमेशा की तरह....
    वाह!!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. कटती है जिन्दगी नदिश की कुछ इस तरह
    हर लम्हा गुजरता है नए इम्तिहान से
    सुन्दर सृजन
    दर्द भी मुझे प्यारे हैं क्योंकि वो ही तो हर पल साथ हमारे हैं ,

    जवाब देंहटाएं
  5. ज़िन्दगी एक इम्तिहान ही तो है ...
    बहुत लाजवाब शेर और दिलकश ग़ज़ल ...

    जवाब देंहटाएं

  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 4 सितंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  7. हर लम्हां गुज़रता है नये इम्तिहान से....
    बहुत सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  8. मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
    फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से......बहुत ख़ूब !

    जवाब देंहटाएं

टिप्पणी पोस्ट करें