कह सकते हो





यादों की इक छाँव में बैठा रहता हूँ 
अक्सर दर्द के गाँव में बैठा रहता हूँ
तुमने मुझसे हाल जहाँ पूछा था मेरा
मैं अब भी उस ठाँव में बैठा रहता हूँ

⏺️ ⏺️ ⏺️

तुमको गर हैरानी है, तो कह सकते हो
रिश्ता ये बेमानी है, तो कह सकते हो
मैं बाहर से जो भी हूँ वो ही अंदर से
ये मेरी नादानी है, तो कह सकते हो

⏺️ ⏺️ ⏺️

चित्र साभार- गूगल

Comments

  1. वाह!!!
    कमाल की भावाभिव्यक्ति..
    लाजवाब

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

      Delete
  2. बहुत उम्दा भाव ...,सुन्दर सृजन ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

      Delete
  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 09 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी रचना के चयन के लिए बेहद शुक्रिया

      Delete
  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-12-2019) को    "नारी का अपकर्ष"   (चर्चा अंक-3545)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी रचना के चयन के लिए हार्दिक आभार

      Delete
  5. वाहः मधुर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete

  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ....... ,.....11 दिसंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी रचना के चयन के लिए हार्दिक आभार

      Delete
  7. बढ़िया मुक्तक है।

    ReplyDelete
  8. बेहतरीन सृजन सर
    सादर

    ReplyDelete
  9. क्या आपको वेब ट्रैफिक चाहिए मैं वेब ट्रैफिक sell करता हूँ,
    Full SEO Optimize
    iss link me click kare dhekh sakte hai - https://bit.ly/2M8Mrgw

    ReplyDelete

Post a Comment