दूर मुझसे न रहो तुम

दूर मुझसे न रहो तुम यूँ बेखबर बन कर
क़रीब आओ चलो साथ हमसफ़र बन कर

जहाँ भी देखता हूँ, बस तुम्हारा चेहरा है
बसी हो आँख में तुम ही मेरी नज़र बन कर

सफ़र में तेज हुई धूप ग़मों की जब भी
तुम्हारी याद ने साया किया शजर* बन कर

महक रही है हरेक सांस में ख़ुश्बू तेरी
मेरे वज़ूद में तू है दिलो-जिगर बन कर

शब-ए-हयात* में उल्फ़त* की रोशनी लेकर
चले भी आओ ज़िन्दगी में तुम सहर बन कर

तुम्हारे नाम पर कर दे, ये ज़िन्दगी भी नदीश
रहो ता-उम्र मेरे यूँ ही तुम अगर बन कर


चित्र साभार- गूगल

शजर- पेड़
शब-ए-हयात- जीवन की रात
उल्फ़त- प्रेम

Post a Comment

16 Comments

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 08 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी रचना के चयन के लिए बहुत बहुत आभार आपका

      Delete
  2. बहुत खूब ......,सादर नमन

    ReplyDelete
  3. बेहतरीन व लाजवाब सृजन ।

    ReplyDelete
  4. बेहतरीन सृजन, प्रेमपगी गजल।

    ReplyDelete
  5. वाह!!!
    लाजवाब सृजन

    ReplyDelete
  6. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (09-12-2019) को "नारी-सम्मान पर डाका ?"(चर्चा अंक-3544) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं…
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    ReplyDelete