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रस्ता मुहब्बत का

अपने कुछ ऐसे हैं
पूछो मत कैसे हैं

रस्ता मुहब्बत का
गुल, काँटों जैसे हैं

तुम से क्या मतलब, हम
ऐसे या वैसे हैं

झुक जाएगी दुनिया
खीसे में पैसे हैं?

दुनिया में हम जैसे
बस जैसे-तैसे हैं

चित्र साभार- गूगल

खो गया मैं

प्यार जब भी तेरा याद आने लगा
ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

लाखों दर्द अपने दिल मे छिपाये हुए
अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए
खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में
और खुद से ही खुद को छिपाने लगा

ज़ख्म, ख्वाबों के रिसते रहे रातभर
दर्द, कदमों पे बिछते रहे रातभर
तेरे वादों के जख्मों पे फिर मैं सनम
तेरी यादों का मरहम लगाने लगा

धूप खिलवत की तन को भिगोती रही
चाहतें रात भर मेरी रोती रही
फिर भी पतवार उम्मीद की थामकर
सब्र की धार मैं आजमाने लगा

हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था
क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था
जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो
जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा

चित्र साभार- गूगल

कोई दवा न मिली


फेफड़ों को खुली हवा न मिली
न मिली आपसे वफ़ा न मिली

दुश्मनी ढूँढ़-ढूँढ़ कर हारी
दोस्ती है जो लापता, न मिली

वक़्त पर छोड़ दिया है सब कुछ
दर्दे-दिल की कोई दवा न मिली

हर किसी हाथ में मिला खंज़र
आपकी बात भी जुदा न मिली

सोचता है नदीश ये अक्सर
ज़िन्दगी आपके बिना न मिली

चित्र साभार- गूगल

नमक ग़मों का

शब्दों की जुबानी लिखता हूँ
गीतों की कहानी लिखता हूँ

दर्दों के विस्तृत अम्बर में
भावों के पंछी उड़ते हैं
नाचे हैं शरारे उल्फ़त के
जब तार हृदय के जुड़ते हैं

हर सुबह से शबनम लेकर
फिर शाम सुहानी लिखता हूँ

जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता
हर बात प्रीत से होती है
तब भावनाओं के धागे में
अश्क़ों को आँख पिरोती है

ऐसे ही अपनेपन को मैं
रिश्तों की निशानी लिखता हूँ

पानी में आँखों के भीतर
ये नमक ग़मों का घुलता है
जब नेह की होती है बारिश
तब मैल हृदय का धुलता है

दरिया के निर्मल जल सा मैं
आँखों का पानी लिखता हूँ

चित्र साभार- गूगल

मौसम है सुहाना दिल का

चुन लिया जबसे ठिकाना दिल का।
खूब मौसम है सुहाना दिल का।।

सांस लेना भी हो गया मुश्किल
खेल समझे थे लगाना दिल का।।

कैसे करते न नाम पर तेरे
मुस्कुराहट है या बयाना दिल का।।

थक गई है उनींदे रस्तों से
नींद को दे दो न शाना दिल का।।

भूल जाओ 'नदीश' अब ख़ुद को
इश्क़ है, रोग पुराना दिल का।।

चित्र साभार- गूगल

जो मेरा था




चला शहर को तो वो गांव बेच आया है
अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है
मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने
शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है

●◆●◆●

जो मेरा था तलाश हो गया
हाँ यक़ीन था काश हो गया
मेरी आँखों में चहकता था
परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया

●◆●◆●

किनारों से बहुत रूठा हुआ है
कलेजा नाव का सहमा हुआ है
पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
समंदर दर्द में डूबा हुआ है

●◆●◆●

चित्र साभार- गूगल

यादों के हवाले




कश्कोल लेके आया हूँ, आँखों में आस का
रक्खोगे पास, सिर्फ तुम ही मेरी प्यास का

यादों के हवाले ही, इसे कर दो आख़िरश
कुछ और ही चारा नहीं दिल-ए-उदास का

कर ली है इसलिए भी तो नींदों से दुश्मनी
आँखों में ख़्वाब जागता रहता है ख़ास का

निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला
लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का

महसूस ये हुआ है, शब-ए-वस्ल ऐ नदीश
लिपटे हैं आग से बदन लिए कपास का

चित्र साभार- गूगल

ये आलम उदास है

तुम बिन बहार का मौसम उदास है।
आकर तो देखो ये आलम उदास है।।

खिलने से पहले ही मसले हैं गुंचे 
मंज़र ये देखकर शबनम उदास है।।

आराम आये भी तो कैसे आये
ज़ख्मों की शिद्दत से मरहम उदास है।।

बीमारे-उल्फ़त हैं कितने न पूछो
कोई ज़ियादा कोई कम उदास है।।

आके किसी रोज देखो नदीश को
जब से गये हो तुम हरदम उदास है।।

चित्र साभार-गूगल

आशाओं का दामन


ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय
क्यों अपनी गरिमा खोते हैं
समझौतों पर आधारित जो
वो रिश्ते भार ही होते हैं

क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम
आओ हर पल को जी लें
जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें
और प्रेम का विष पी लें

स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो
बीज अमन के बोते हैं

आशाओं का दामन थामे
हर दुःख का मरुथल पार करें
इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में 
सपनो को साकार करें

सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो
शाम हुई घर लौटे हैं

जो ह्रदय, हीन है भावों से
उसमें निष्ठा का मोल कहाँ
उसके मानस की नदिया में
अनुरागों का किल्लोल कहाँ

है जीवित, जो दूजे दुख में
अपने एहसास भिगोते हैं

चित्र साभार- गूगल


ख़्वाबों का मौसम




कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं
ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी
आँखों में फिर से महकने लगे हैं

उमंगों की सूखी नदी के किनारे
आशाओं की नाव टूटी पड़ी है
तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की
हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है

ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये
अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं

हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी
मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये
तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश
मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये

पाकर के अपने ख्यालों में तुमको
अरमान दिल के मचलने लगे हैं

ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे
मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है
तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन
है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है

भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम
खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं

चित्र साभार- गूगल

साँसों का साथ

ये करिश्मा मोहब्बत में होते देखा
लब पे हँसी आँख को रोते देखा
गुजरे है मंज़र भी अजब आँखों से
साहिल को कश्तियां डुबोते देखा

* * *
 
पानी से है बिल्कुल खाली सूरत
लोग लिये फिरते हैं जाली सूरत
खाते हैं अक्सर फ़रेब चेहरे से
देखकर सब ये भोली-भाली सूरत

* * *

तेरे ही साथ को साँसों का साथ कहता हूँ
तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुजरे जो चंद पल मेरे
बस उन्हीं लम्हों को सारी हयात कहता हूँ

* * *
 चित्र साभार- गूगल

हयात-जीवन
कायनात- दुनिया

चुपके-चुपके



व्याकुल हो जब भी मन मेरा
तब-तब गीत नया गाता है
आँखों में इक सपन सलोना 
चुपके-चुपके आ जाता है

जीवन के सारे रंगों से 
भीग रहा है मेरा कण-कण
मुझे कसौटी पर रखकर ये
समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण

गड़ता है जो भी आँखों में
समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया
वो भी तो मेरा अपना था 
रिश्ता था कच्चे धागों का
मगर टूटना इक सदमा था

घातों से चोटिल मेरा मन
आज बहुत ही घबराता है

जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका 
नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती
मिलकर बेबस-बेकस चीटी
इक ताकतवर भीड़ बनती

छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो
यही तो जीवन कहलाता है



 चित्र साभार- गूगल

मेरी आँखों को

ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम
मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें

ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी
रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें

तेरी ख़ुश्बू से महकता है प्यार का गुलशन
सींच के अश्क़, बीज याद के बोई आँखें

हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ
मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें

चित्र साभार- गूगल

ज़िन्दगी का मौसम


तीन मुक्तक

उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया, हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल को बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम
***

प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी एक निगाह से बेताब दिल हुआ
हज़ार गुल दिल मे ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ
***

पल-पल बोझल था मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के जोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात
***

 चित्र साभार- गूगल


शादाब- खुशियों भरा

ग़म की रेत पे

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है
आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है

ख़ुद को अलग करोगे कैसे दर्द से, बोलो
दाग़, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है

अश्क़ सरापा* ख़्वाब मेरे, कहते हैं मुझसे
ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है

मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है
फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है

पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है

वज़्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं
मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है

इतनी यादों की दौलत हो गई इकट्ठी
अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है 


चित्र साभार- गूगल 

*सरापा- सर से पाँव तक

तेरा ख़याल

याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं

तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं

इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
 

चित्र साभार- गूगल

अश्क़ों का बादल

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्क़ों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में

धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यकीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हँस कर हँसी ने हँसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

चित्र साभार- गूगल

मर्ग-ए-तमन्ना- तमन्ना की मौत
सफ़ह- पृष्ठ, पेज

मेरी तस्वीर

ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना 

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना

चित्र साभार- गूगल

तल्ख़- कड़वा
आईना-ए-हयात- जीवन दर्पण

तेरे बगैर

किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफ़ा सा, खैर रहा है

हासिल यही है तज़ुर्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
किरदार तो अपनों में मेरा ग़ैर रहा है

मुझको बहुत अज़ीज़, फ़क़ीरी है मेरी
हाँ गुम्बदों के सर पे मेरा पैर रहा है

फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र
बनके लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे नदीश ये तेरे बगैर रहा है

चित्र साभार- गूगल

बार-ए-अना- अहंकार का बोझ

ज़िन्दगी

सैकड़ों खानों में जैसे बंट गई है ज़िन्दगी
साथ रह कर भी लगे है अजनबी है ज़िन्दगी

झाँकता हूँ आईने में जब भी मैं अहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी

न तो मिलने की ख़ुशी है न बिछड़ जाने का ग़म
हाय, ये किस मोड़ पे आकर रुकी है ज़िन्दगी

सीख ले अब लम्हें-लम्हें को ही जीने का हुनर
कौन जाने और अब कितनी बची है ज़िन्दगी

आख़िरी है वक़्त कि अब तो चले आओ सनम
बस तुम्हें ही देखने तरसी हुई है ज़िन्दगी

वस्ल भी है प्यार भी है प्यास भी है जाम भी
फिर भी जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

अब कहाँ तन्हाई ओ' तन्हाई का साया नदीश
उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी

चित्र साभार- गूगल