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न कोई मंजिल के निशां

सारी दुनिया भुला दी

आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे

छिपा सकते हो कब तक

कैसे यक़ीन उसको हो

इतनी यादों की दौलत

आँखों में एक ख्वाब चमकने लगता है

निचोड़ के मेरी पलक को

तुम्हारे हिज़्र में

ठहरी है ग़म की झील में

अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली

मंज़र दिल का उदास

ख्यालों में तेरे खोया है

हम तुम्हारी यादों से .

चांदनी की तरह