Showing posts with label रहगुज़र. Show all posts
Showing posts with label रहगुज़र. Show all posts

आस की छत

कड़ी है धूप और न साया-ए-शजर यारों
न हमसफ़र है, उसपे ज़ीस्त का सफ़र यारों

न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों

आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब
लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों

बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम
मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों

मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों

चित्र साभार- गूगल

साया-ए-शजर- पेड़ की छांव
ज़ीस्त- जीवन, ज़िन्दगी
चराग़-ए-अश्क़- आंसू के दीये
दरो-दीवारे-ख़्वाब- ख़्वाब के दरवाजे और दीवार
गुले-एहसास- अनुभूति का फूल
रक़ीब- प्रेम में प्रतिद्वंद्वी
मोतबर- विश्वसनीय, भरोसेमंद
मुद्दत- लंबा अंतराल, काफी समय से

मगर चाहता हूँ

मुहब्बत में अपनी असर चाहता हूँ
वफ़ा से भरी हो नज़र चाहता हूँ

तेरा दिल है मंज़िल मेरी चाहतों की
नज़र की तेरी रहगुज़र चाहता हूँ

रहो मेरी आँखों के रु-ब-रु तुम
बस ऐसी ही शामो-सहर चाहता हूँ

कभी बांटकर, मेरी तनहाइयों को
अगर जान लो, किस कदर चाहता हूँ

वफ़ा दौर-ए-हाज़िर में किसको मिली है
मेरे दोस्त तुझसे मगर चाहता हूँ

बनाकर तेरे ख़्वाबों में आशियाँ मैं
करूँ ज़िन्दगी को बसर चाहता हूँ

सफ़र में तुझी को नदीश ज़िन्दगी के
मैं अपने लिए हमसफ़र चाहता हूँ

चित्र साभार- गूगल

न कोई मंजिल के निशां

मिरे वज़ूद को दिल का जो घर दिया तूने
इश्क़ की राह को आसान कर दिया तूने

ख़लिश मैं ओस की महसूस करूं फूलों में
दिल के एहसास को कैसा असर दिया तूने

रहेगी याद ये सौग़ात उम्र भर तेरी
सिर्फ़ आंसू ही सही कुछ मगर दिया तूने

न कोई नक्स-ए-पा है न कोई मंजिल के निशां
मेरी हयात को ये रहगुज़र दिया तूने

ख़ुद अपने घर में ही मेहमान हो गया है नदीश
मेरे एहसास को ऐसा सफ़र दिया तूने

चित्र साभार-गूगल