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जो मेरा था




चला शहर को तो वो गांव बेच आया है
अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है
मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने
शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है

●◆●◆●

जो मेरा था तलाश हो गया
हाँ यक़ीन था काश हो गया
मेरी आँखों में चहकता था
परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया

●◆●◆●

किनारों से बहुत रूठा हुआ है
कलेजा नाव का सहमा हुआ है
पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
समंदर दर्द में डूबा हुआ है

●◆●◆●

चित्र साभार- गूगल

ख़्वाबों का मौसम




कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं
ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी
आँखों में फिर से महकने लगे हैं

उमंगों की सूखी नदी के किनारे
आशाओं की नाव टूटी पड़ी है
तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की
हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है

ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये
अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं

हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी
मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये
तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश
मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये

पाकर के अपने ख्यालों में तुमको
अरमान दिल के मचलने लगे हैं

ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे
मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है
तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन
है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है

भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम
खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं

चित्र साभार- गूगल

चुपके-चुपके



व्याकुल हो जब भी मन मेरा
तब-तब गीत नया गाता है
आँखों में इक सपन सलोना 
चुपके-चुपके आ जाता है

जीवन के सारे रंगों से 
भीग रहा है मेरा कण-कण
मुझे कसौटी पर रखकर ये
समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण

गड़ता है जो भी आँखों में
समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया
वो भी तो मेरा अपना था 
रिश्ता था कच्चे धागों का
मगर टूटना इक सदमा था

घातों से चोटिल मेरा मन
आज बहुत ही घबराता है

जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका 
नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती
मिलकर बेबस-बेकस चीटी
इक ताकतवर भीड़ बनती

छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो
यही तो जीवन कहलाता है



 चित्र साभार- गूगल

मेरी आँखों को

ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम
मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें

ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी
रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें

तेरी ख़ुश्बू से महकता है प्यार का गुलशन
सींच के अश्क़, बीज याद के बोई आँखें

हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ
मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें

चित्र साभार- गूगल

ज़िन्दगी का मौसम


तीन मुक्तक

उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया, हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल को बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम
***

प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी एक निगाह से बेताब दिल हुआ
हज़ार गुल दिल मे ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ
***

पल-पल बोझल था मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के जोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात
***

 चित्र साभार- गूगल


शादाब- खुशियों भरा

ग़म की रेत पे

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है
आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है

ख़ुद को अलग करोगे कैसे दर्द से, बोलो
दाग़, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है

अश्क़ सरापा* ख़्वाब मेरे, कहते हैं मुझसे
ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है

मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है
फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है

पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है

वज़्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं
मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है

इतनी यादों की दौलत हो गई इकट्ठी
अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है 


चित्र साभार- गूगल 

*सरापा- सर से पाँव तक

तेरा ख़याल

याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं

तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं

इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
 

चित्र साभार- गूगल

अश्क़ों का बादल

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्क़ों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में

धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यकीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हँस कर हँसी ने हँसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

चित्र साभार- गूगल

मर्ग-ए-तमन्ना- तमन्ना की मौत
सफ़ह- पृष्ठ, पेज

मेरी तस्वीर

ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना 

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना

चित्र साभार- गूगल

तल्ख़- कड़वा
आईना-ए-हयात- जीवन दर्पण

तेरे बगैर

किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफ़ा सा, खैर रहा है

हासिल यही है तज़ुर्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
किरदार तो अपनों में मेरा ग़ैर रहा है

मुझको बहुत अज़ीज़, फ़क़ीरी है मेरी
हाँ गुम्बदों के सर पे मेरा पैर रहा है

फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र
बनके लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे नदीश ये तेरे बगैर रहा है

चित्र साभार- गूगल

बार-ए-अना- अहंकार का बोझ

ज़िन्दगी

सैकड़ों खानों में जैसे बंट गई है ज़िन्दगी
साथ रह कर भी लगे है अजनबी है ज़िन्दगी

झाँकता हूँ आईने में जब भी मैं अहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी

न तो मिलने की ख़ुशी है न बिछड़ जाने का ग़म
हाय, ये किस मोड़ पे आकर रुकी है ज़िन्दगी

सीख ले अब लम्हें-लम्हें को ही जीने का हुनर
कौन जाने और अब कितनी बची है ज़िन्दगी

आख़िरी है वक़्त कि अब तो चले आओ सनम
बस तुम्हें ही देखने तरसी हुई है ज़िन्दगी

वस्ल भी है प्यार भी है प्यास भी है जाम भी
फिर भी जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

अब कहाँ तन्हाई ओ' तन्हाई का साया नदीश
उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी

चित्र साभार- गूगल

बिखर जाने दे

अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे
मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे

मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे
चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे

दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं
दर्द कोई नया ज़िगर से गुज़र जाने दे

यूँ नहीं होता है इसरार से हमराह कोई
गुज़र जायेगा तन्हा ये सफ़र जाने दे

नदीश आयेगा कभी तो हमसफ़र तेरा
जहां भी जाये मुंतज़िर ये नज़र जाने दे

चित्र साभार- गूगल

इसरार- आग्रह
मुंतज़िर- प्रतीक्षारत

दर्द का एक पल

बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा
लिपट के रास्ते से मेरे तर-ब-तर निकला

खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू
मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला

रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को 
उसके तहखाने से कटा हुआ शजर निकला

हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे
दर्द का एक पल जो ख़ुशियों से बेहतर निकला

चित्र साभार- गूगल

अच्छा है कि

रखता नहीं है निस्बतें  किसी  से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा, फ़रेब,  खून-ए-वफ़ा  रस्म हो गए
डरने लगा  है अब  तो  दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से  इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश  भी  नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

हासिल है रंजिशों का तबाही-ओ-तबाही
रहता है मगर फिर भी दुश्मनी से आदमी

अपना पराया भूल के सब एक हो यहां
अच्छा है कि मिल के रहे सभी से आदमी

अच्छा है कि नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पाता है कुछ नया किसी कमी सी आदमी

चित्र साभार- गूगल

÷÷÷÷÷
निस्बत- अपनापन
आजिज़ी- बेमन, बेरुख़ी
मुकम्मल- पूर्ण

आस की छत

कड़ी है धूप और न साया-ए-शजर यारों
न हमसफ़र है, उसपे ज़ीस्त का सफ़र यारों

न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों

आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब
लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों

बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम
मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों

मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों

चित्र साभार- गूगल

साया-ए-शजर- पेड़ की छांव
ज़ीस्त- जीवन, ज़िन्दगी
चराग़-ए-अश्क़- आंसू के दीये
दरो-दीवारे-ख़्वाब- ख़्वाब के दरवाजे और दीवार
गुले-एहसास- अनुभूति का फूल
रक़ीब- प्रेम में प्रतिद्वंद्वी
मोतबर- विश्वसनीय, भरोसेमंद
मुद्दत- लंबा अंतराल, काफी समय से

मगर चाहता हूँ

मुहब्बत में अपनी असर चाहता हूँ
वफ़ा से भरी हो नज़र चाहता हूँ

तेरा दिल है मंज़िल मेरी चाहतों की
नज़र की तेरी रहगुज़र चाहता हूँ

रहो मेरी आँखों के रु-ब-रु तुम
बस ऐसी ही शामो-सहर चाहता हूँ

कभी बांटकर, मेरी तनहाइयों को
अगर जान लो, किस कदर चाहता हूँ

वफ़ा दौर-ए-हाज़िर में किसको मिली है
मेरे दोस्त तुझसे मगर चाहता हूँ

बनाकर तेरे ख़्वाबों में आशियाँ मैं
करूँ ज़िन्दगी को बसर चाहता हूँ

सफ़र में तुझी को नदीश ज़िन्दगी के
मैं अपने लिए हमसफ़र चाहता हूँ

चित्र साभार- गूगल

दर्द से निस्बत



जो भी ख़लिश* थी दिल में अहसास हो गई है
दर्द से निस्बत* मुझे कुछ खास हो गई है

वज़ूद हर खुशी का ग़म से है इस जहां में
फिर ज़िन्दगी क्यूं इतनी उदास हो गई है

चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मुहब्बत का
दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गई है

शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरुख़ी का
यादों में मुहब्बत की अरदास हो गई है

नदीश मुहब्बत में वो वक़्त आ गया है
तस्कीन* प्यास की भी अब प्यास हो गई है

चित्र साभार- गूगल

ख़लिश- चुभन
निस्बत- लगाव
तस्कीन- संतुष्टि

फूल अरमानों का


कड़ी है धूप चलो छाँव तले प्यार करें 
जहाँ ठहर के वक़्त आँख मले प्यार करें 

नज़रिया बदलें तो दुनिया भी बदल जाएगी 
भूल के रंजिशें, शिकवे-ओ-गिले प्यार करें 

वफ़ा ख़ुलूस के जज्बों से लबालब होकर
फूल अरमानों का जब-जब भी खिले प्यार करें 

दिलों के दरम्यां रह जाये न दूरी कोई 
चराग़ दिल में कुर्बतों का जले प्यार करें 

तमाम नफ़रतें मिट जाये दिलों से अपने 
तंग एहसास कोई जब भी खले प्यार करें 

कौन अपना या पराया नदीश छोड़ो भी 
मिले इंसान जहाँ जब भी भले प्यार करें 


*चित्र साभार-गूगल

कहूँ किसको

दिल की हर बात मैं कहूँ किसको
अपने हालात मैं कहूँ किसको

मैंने खोया तो पा लिया दिल ने
जीत कर मात मैं कहूँ किसको

अश्क़ भी याद भी है, ग़म भी है
इनमें सौगात मैं कहूँ किसको



अब्र के साथ आँख भी बरसे
अबके बरसात मैं कहूँ किसको

तुम नहीं तो नहीं है रंग कोई
दिन किसे रात मैं कहूँ किसको

ज़िस्म बेदिल 'नदीश' सबके यहाँ
अपने जज़्बात मैं कहूँ किसको


चित्र साभार : गूगल

ये आँखें जब


धुंधला-धुंधला अक़्स ख़ुशी कम दिखती है
ये आँखें जब आईने में नम दिखती है

आ तो गया हमको ग़मों से निभाना लेकिन
हमसे अब हर खुशी बरहम दिखती है

आँखों में चुभ जाते हैं ख़्वाबों के टुकड़े
नींदों में बेचैनी सी हरदम दिखती है

आसमान कितना रोया है तुम क्या जानों
तुमको तो फूलों पे बस शबनम दिखती है

दिल तो टूटा है नदीश का माना लेकिन
जाने-ग़ज़ल मेरी तू क्यों पुरनम दिखती है

चित्र साभार-गूगल