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अश्क़ों का बादल

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्क़ों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में

धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यकीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हँस कर हँसी ने हँसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

चित्र साभार- गूगल

मर्ग-ए-तमन्ना- तमन्ना की मौत
सफ़ह- पृष्ठ, पेज

ख़्वाब की गलियों में




यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे
ज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे 

एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ 
ख़्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 



बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर 
इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे 

रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर 
इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे 

आ गया एहसास के फिर चीथड़े ओढ़े हुए 
दर्द का लम्हा जिसे हम मुल्तवी करते रहे 

दिल्लगी दिल कि लगी में फर्क कितना है नदीश 
दिल लगाया हमने जिनसे दिल्लगी करते रहे


चित्र साभार-गूगल

मुसलसल- लगातार, निरंतर
मुल्तवी- टालना