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शहर में तेरे

मकानों के दरम्यान कोई घर नहीं मिला
शहर में तेरे प्यार का मंज़र नहीं मिला

झुकी जाती है पलकें ख़्वाबों के बोझ से
आँखों को मगर नींद का बिस्तर नहीं मिला

सर पे लगा है जिसके इलज़ाम क़त्ल का
हाथों में उसके कोई भी खंज़र नहीं मिला

किस्तों में जीते जीते टुकड़ों में बंट गए
खुद को समेट लूँ कभी अवसर नहीं मिला

फिरता है दर्द सैकड़ों लेकर यहां नदीश
अपनों की तरह से कोई आकर नहीं मिला

चित्र साभार- गूगल

मुद्दतों से जिसे


दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाये रक्खा
इन चराग़ों को हवाओं से बचाये रक्खा

हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
हमने खुद को तेरी यादों में डुबाये रक्खा

तिरे ख़्याल ने दिन भर मुझे सताया है
हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाये रक्खा

वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन
मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाये रक्खा

उमड़ पड़ा है ये तूफ़ान देखकर तुमको
मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाये रक्खा

रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें
एक-एक हर्फ़ ने अहसास बनाये रक्खा

चित्र साभार- गूगल

*हर्फ़- अक्षर

कहकशां



पल भर तुमसे बात हो गई
ख़ुशियों की सौग़ात हो गई

दुश्मन है इन्सां का इन्सां
कैसी उसकी जात हो गई

आँखों में है एक कहकशां
अश्कों की बारात हो गई

वक़्त, वक़्त ने दिया ही नहीं
बातें अकस्मात हो गई

जख़्म मिले ता-उम्र जो नदीश
रिश्तों की सौग़ात हो गई

चित्र साभार- गूगल

*कहकशां- आकाशगंगा, गैलेक्सी

सपने, आँखें, नींद


समझदार तो सिर्फ़ सियासत करते हैं
पागल हैं जो लोग, मुहब्बत करते हैं

ये तो सोचा नहीं दोस्ती में हमने
आगे चलकर दोस्त अदावत करते हैं

दिल से उसे भुला दें, गर है शर्त यही
सांसों की हम रद्द ज़मानत करते हैं

मिलता है अश्क़ों को देश निकाला जब
सपने, आँखें, नींद बग़ावत करते हैं

कोना तेरी यादों का महफूज़ रखा
इतनी दिल के ज़ख़्म रियायत करते हैं

अपनी तुर्बत से अब चलो नदीश उठो 
मिट्टी से वो रोज़ शिकायत करते हैं

चित्र साभार- गूगल

तुर्बत- कब्र

दर्द का लम्हा



यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे
ज़िन्दगी भर  आरज़ू-ए-ज़िन्दगी  करते  रहे 

एक  मुद्दत  से  हक़ीक़त  में नहीं आये यहाँ 
ख़्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 

बड़बड़ाना  अक्स  अपना आईने में देखकर 
इस तरह ज़ाहिर वो अपनी  बेबसी करते रहे 

रोकने की कोशिशें तो खूब कीं पलकों ने पर 
इश्क़ में  पागल थे  आँसू  ख़ुदकुशी करते रहे

आ गया एहसास के  फिर चीथड़े  ओढ़े  हुए 
दर्द  का  लम्हा  जिसे  हम  मुल्तवी करते रहे

दिल्लगी, दिल की लगी में फर्क कितना है नदीश 
दिल लगाया हमने  जिनसे  दिल्लगी  करते रहे

चित्र साभार- गूगल
मुल्तवी- टालना

यादों की टिमटिम

बनकर तेरी यादों की ख़ुश्बू आये हैं
दर्द के कुछ कस्तूरी आहू आये हैं

भेजा है पैग़ाम तुम्हारे ख़्वाबों ने
बनकर क़ासिद आँख में आंसू आये हैं

रात अमावस की औ' यादों की टिमटिम
ज्यों राहत के चंचल जुगनू आये हैं

महका-महका हर क़तरा है मेरे तन का
हम जब से तेरा दामन छू आये हैं

जब भी बादल काले-काले दिखे नदीश
ज़हन में बस तेरे ही गेसू आये हैं

चित्र साभार- गूगल

आहू- मृग, हिरण
क़ासिद- पत्रवाहक, डाकिया
गेसू- ज़ुल्फ़, बाल

मंज़र बहार के

रस्ते तो ज़िन्दगी के साज़गार बहुत थे
खुशियों को मगर हम ही नागवार बहुत थे

बिखरे हुए थे चार सू मंज़र बहार के
बिन तेरे यूँ लगा वो सोगवार बहुत थे

ये जान के भी अहले-जहां में वफ़ा नहीं
दुनिया की मोहब्बत में गिरफ्तार बहुत थे

थी नींद कैद, आंसुओं की ज़द में रात भर
आँखों में चंद ख़्वाब बेक़रार बहुत थे

झुलसे मेरी वफ़ा के पांव आख़िरश नदीश
या रब तेरे यक़ीन में शरार बहुत थे

चित्र साभार- गूगल

साज़गार- अनुकूल
नागवार- अप्रिय
सोगवार- दुखी
सू- दिशा

ख़्वाबों को

तूफ़ान में कश्ती को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्दे-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों मे कोई और नज़ारा नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो साथ तेरे हमने गुज़ारा नहीं होता

चित्र साभार- गूगल

अनमनी है ज़िन्दगी


सैकड़ों खानों में जैसे बंट गयी है ज़िन्दगी
साथ रहकर भी लगे है अज़नबी है ज़िन्दगी

झांकता हूँ आईने में जब भी मैं एहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी

न तो मिलने कि ख़ुशी है न बिछड़ जाने का ग़म
हाय ये किस मोड़ पे आकर रुकी है ज़िन्दगी

सीख ले अब लम्हें-लम्हें को ही जीने का हुनर
कौन जाने और अब कितनी बची है ज़िन्दगी

वस्ल भी है, प्यार भी है, प्यास भी है जाम भी
फिर भी जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

अब कहाँ तन्हाई औ' तन्हाई का साया नदीश
उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी

चित्र साभार- गूगल

काफ़िले दर्द के


जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं 
काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं

तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी 
अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं

किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो
अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं

इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से
रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं

देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं

बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं

खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा
उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं

बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश
रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं

चित्र साभार-गूगल

दर्द का मौसम

कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है
हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है

दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है

न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक
हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है

जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते
वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है

ग़मों की दास्तां किसको सुनाता मैं नदीश
न हमनवां है, न हमदम दिखाई देता है

चित्र साभार- गूगल

आंसुओं के ज़िस्म का



वस्ल की शब का है मंज़र आँख में ठहरा हुआ
एक सन्नाटा है सारे शहर में फैला हुआ

दोस्ती-ओ-प्यार की बातें जो की मैंने यहाँ
किस कदर जज़्बात का फिर मेरे तमाशा हुआ

क्यों मैं समझा था सभी मेरे हैं औ' सबका हूँ मैं
सोचता हूँ जाल में रिश्तों के अब उलझा हुआ

फुसफुसा कर क्या कहा जाने ख़ुशी से दर्द ने
आंसुओं के ज़िस्म का हर ज़ख्म है सहमा हुआ

रिस रही थी दर्द की बूंदें भी लफ़्ज़ों से नदीश
घर मेरे अहसास का था इस कदर भीगा हुआ

चित्र साभार-गूगल


मगर चाहता हूँ

मुहब्बत में अपनी असर चाहता हूँ
वफ़ा से भरी हो नज़र चाहता हूँ

तेरा दिल है मंज़िल मेरी चाहतों की
नज़र की तेरी रहगुज़र चाहता हूँ

रहो मेरी आँखों के रु-ब-रु तुम
बस ऐसी ही शामो-सहर चाहता हूँ

कभी बांटकर, मेरी तनहाइयों को
अगर जान लो, किस कदर चाहता हूँ

वफ़ा दौर-ए-हाज़िर में किसको मिली है
मेरे दोस्त तुझसे मगर चाहता हूँ

बनाकर तेरे ख़्वाबों में आशियाँ मैं
करूँ ज़िन्दगी को बसर चाहता हूँ

सफ़र में तुझी को नदीश ज़िन्दगी के
मैं अपने लिए हमसफ़र चाहता हूँ

चित्र साभार- गूगल

फूल अरमानों का


कड़ी है धूप चलो छाँव तले प्यार करें 
जहाँ ठहर के वक़्त आँख मले प्यार करें 

नज़रिया बदलें तो दुनिया भी बदल जाएगी 
भूल के रंजिशें, शिकवे-ओ-गिले प्यार करें 

वफ़ा ख़ुलूस के जज्बों से लबालब होकर
फूल अरमानों का जब-जब भी खिले प्यार करें 

दिलों के दरम्यां रह जाये न दूरी कोई 
चराग़ दिल में कुर्बतों का जले प्यार करें 

तमाम नफ़रतें मिट जाये दिलों से अपने 
तंग एहसास कोई जब भी खले प्यार करें 

कौन अपना या पराया नदीश छोडो भी 
मिले इंसान जहाँ जब भी भले प्यार करें 



*चित्र साभार-गूगल

ख़ुश्बू आँखों में


ख़्वाब तेरा करता है वो जादू आँखों में
भर उठती है ख़्वाब की हर ख़ुश्बू आँखों में

क़त्ल बताओ कैसे फिर मेरा न होता
रक्खे थे उसने लम्बे चाकू आँखो में

मचल मचल जाती है ये दीदार को तेरे
अब हमको भी रहा नहीं काबू आँखों में

दर्द कोई जब दिल को मेरे छेड़े आकर
जोर से हँसते हैं मेरे आंसू आँखों में

ऐ नदीश जिसपे भी किया भरोसा तूने
चला गया है झोंक के वो बालू आँखों में

चित्र साभार- गूगल

कुछ नहीं


ग़र मेरे एहसास कुछ नहीं
तो फिर मेरे पास कुछ नहीं

आँखों में ये आँसू तो हैं
हाँ कहने को खास कुछ नहीं

कितने रिश्ते-नाते मेरे
होने का आभास कुछ नहीं

ज़िन्दा जो मेरी सांसों से
उससे भी अब आस कुछ नहीं

अब नदीश मिलने आये हो
ज़िस्म बचा है सांस कुछ नहीं

चित्र साभार- गूगल

जलते शहर से


न  मिले  चाहे  सुकूं  तेरी  नज़र  से
बारहा  गुजरेंगे  पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह  उट्ठी  है  मेरे  टूटे  ज़िगर  से

ग़मज़दा एहसास  हैं, तन्हाइयां  है
लौट  आये  हैं  मुहब्बत  के सफ़र से

आजमा  कर  दोस्तों  को  जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम  लेगा  लग्ज़िश  में  हाथ  मेरा
है  नदीश  उम्मीद  मेरी,  हमसफ़र से
चित्र साभार- गूगल

सरापा दास्तां हूँ

यहां पर भी हूँ मैं, मैं ही वहां हूँ
ठिकाना है बदन, मैं लामकां हूँ

हमारा साथ है कुछ इस तरह से
तड़प और दर्द तू है, मैं फुगां हूँ

हुई है ग़म से निस्बत जब से मेरी
है सच, न ग़मज़दा हूँ न शादमां हूँ

मुझे पढ़ लो मुझे महसूस कर लो
मैं अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में निहां हूँ

न है उन्वान, न ही हाशिया है
मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ

नदीश आओ ज़माना मुझमें देखो
मैं नस्ल-ए-नौ की मंज़िल का निशां हूँ

चित्र साभार- गूगल

चाँद खिल गया



झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल
खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल 

भटके न  राहगीर  कोई  राह  प्यर   की
रक्खें हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल 

दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया
झरने लगे हैं  आँख से भी   चांदनी के फूल 

बोएंगे मुसलसल जो सभी दुश्मनी के बीज
देखेगी कैसे नस्ल कल की दोस्ती के फूल 

हस्ती को अपनी पहले मुकम्मल तो कीजिये
खिलते हैं बहुत मुश्किलों से आदमी के फूल 

अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम
हर सांस महकती है लिए बन्दिगी के फूल 

है तसफिये कि ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात
खिलते हैं  दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल 

छूकर गुले-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी
होंठो  पे गुनगुना  रहे   हैं शायरी के फूल 

भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी नदीश
अशआर तेरे आये हैं  लेके  सदी के फूल
चित्र साभार-गूगल

क्या पता था


तुम न होगे तो यूँ भी क्या हो जाएगा
कुछ नए ज़ख्मों से राब्ता हो जाएगा

उसको भी तसीरे-उल्फ़त देगी बदल
बेवफ़ा हो तो बावफ़ा हो जाएगा

सीख ली उसने मौसम की अदा
हँसते-हँसते ही वो खफ़ा हो जाएगा

चाहतें अपनी हमने तो कर दी निसार
क्या पता था वो बेवफ़ा हो जाएगा

दर्द मिलते रहें तो न घबरा ऐ दिल
दर्द भी तो कभी दवा हो जाएगा

आप कहें तो कभी मुझको अपना नदीश
दिल क्या ईमान भी आपका हो जाएगा

चित्र साभार- गूगल