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तेरा ख़याल

याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं

तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं

इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
 

चित्र साभार- गूगल

अश्क़ों का बादल

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्क़ों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में

धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यकीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हँस कर हँसी ने हँसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

चित्र साभार- गूगल

मर्ग-ए-तमन्ना- तमन्ना की मौत
सफ़ह- पृष्ठ, पेज

मेरी तस्वीर

ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना 

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना

चित्र साभार- गूगल

तल्ख़- कड़वा
आईना-ए-हयात- जीवन दर्पण

तेरे बगैर

किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफ़ा सा, खैर रहा है

हासिल यही है तज़ुर्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
किरदार तो अपनों में मेरा ग़ैर रहा है

मुझको बहुत अज़ीज़, फ़क़ीरी है मेरी
हाँ गुम्बदों के सर पे मेरा पैर रहा है

फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र
बनके लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे नदीश ये तेरे बगैर रहा है

चित्र साभार- गूगल

बार-ए-अना- अहंकार का बोझ

अच्छा है कि

रखता नहीं है निस्बतें  किसी  से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा, फ़रेब,  खून-ए-वफ़ा  रस्म हो गए
डरने लगा  है अब  तो  दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से  इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश  भी  नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

हासिल है रंजिशों का तबाही-ओ-तबाही
रहता है मगर फिर भी दुश्मनी से आदमी

अपना पराया भूल के सब एक हो यहां
अच्छा है कि मिल के रहे सभी से आदमी

अच्छा है कि नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पाता है कुछ नया किसी कमी सी आदमी

चित्र साभार- गूगल

÷÷÷÷÷
निस्बत- अपनापन
आजिज़ी- बेमन, बेरुख़ी
मुकम्मल- पूर्ण

दर्द से निस्बत



जो भी ख़लिश* थी दिल में अहसास हो गई है
दर्द से निस्बत* मुझे कुछ खास हो गई है

वज़ूद हर खुशी का ग़म से है इस जहां में
फिर ज़िन्दगी क्यूं इतनी उदास हो गई है

चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मुहब्बत का
दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गई है

शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरुख़ी का
यादों में मुहब्बत की अरदास हो गई है

नदीश मुहब्बत में वो वक़्त आ गया है
तस्कीन* प्यास की भी अब प्यास हो गई है

चित्र साभार- गूगल

ख़लिश- चुभन
निस्बत- लगाव
तस्कीन- संतुष्टि

तहखाने नींद के

ये तेरी जुस्तजू से मुझे तज़ुर्बा हुआ
मंज़िल हुई मेरी न मेरा रास्ता हुआ

खुशियों को कहीं भी न कभी रास आऊँ मैं
हाँ सल्तनत में दर्द की ये फैसला हुआ

मिट ना सकेगा ये किसी सूरत भी अब कभी
नज़दीकियों के दरम्यान जो फासला हुआ

जब से खँगालने चले तहखाने नींद के
अश्क़ों की बगावत में ख़्वाब था डरा हुआ

अक्सर ये सोचता हूँ क्या है मेरा वज़ूद
मैं एक अजनबी से बदन में पड़ा हुआ

थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए
कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ

है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ

मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ

अब थम गया नदीश तेरी ख़िल्वतों का शोर
हाँ मिल गया है दर्द कोई बोलता हुआ

चित्र साभार- गूगल

मेरे एहसास की तितली


लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं

ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

चित्र साभार- गूगल

ख़ुश्बू आँखों में


ख़्वाब तेरा करता है वो जादू आँखों में
भर उठती है ख़्वाब की हर ख़ुश्बू आँखों में

क़त्ल बताओ कैसे फिर मेरा न होता
रक्खे थे उसने लम्बे चाकू आँखो में

मचल मचल जाती है ये दीदार को तेरे
अब हमको भी रहा नहीं काबू आँखों में

दर्द कोई जब दिल को मेरे छेड़े आकर
जोर से हँसते हैं मेरे आंसू आँखों में

ऐ नदीश जिसपे भी किया भरोसा तूने
चला गया है झोंक के वो बालू आँखों में

चित्र साभार- गूगल

कुछ नहीं


ग़र मेरे एहसास कुछ नहीं
तो फिर मेरे पास कुछ नहीं

आँखों में ये आँसू तो हैं
हाँ कहने को खास कुछ नहीं

कितने रिश्ते-नाते मेरे
होने का आभास कुछ नहीं

ज़िन्दा जो मेरी सांसों से
उससे भी अब आस कुछ नहीं

अब नदीश मिलने आये हो
ज़िस्म बचा है सांस कुछ नहीं

चित्र साभार- गूगल

जलते शहर से


न  मिले  चाहे  सुकूं  तेरी  नज़र  से
बारहा  गुजरेंगे  पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह  उट्ठी  है  मेरे  टूटे  ज़िगर  से

ग़मज़दा एहसास  हैं, तन्हाइयां  है
लौट  आये  हैं  मुहब्बत  के सफ़र से

आजमा  कर  दोस्तों  को  जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम  लेगा  लग्ज़िश  में  हाथ  मेरा
है  नदीश  उम्मीद  मेरी,  हमसफ़र से
चित्र साभार- गूगल

सरापा दास्तां हूँ

यहां पर भी हूँ मैं, मैं ही वहां हूँ
ठिकाना है बदन, मैं लामकां हूँ

हमारा साथ है कुछ इस तरह से
तड़प और दर्द तू है, मैं फुगां हूँ

हुई है ग़म से निस्बत जब से मेरी
है सच, न ग़मज़दा हूँ न शादमां हूँ

मुझे पढ़ लो मुझे महसूस कर लो
मैं अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में निहां हूँ

न है उन्वान, न ही हाशिया है
मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ

नदीश आओ ज़माना मुझमें देखो
मैं नस्ल-ए-नौ की मंज़िल का निशां हूँ

चित्र साभार- गूगल

तुम न होगे तो




तुम न होगे तो यूँ भी क्या हो जाएगा
कुछ नए ज़ख्मों से राब्ता हो जाएगा

उसको भी तासीरे-उल्फ़त देगी बदल
बेवफ़ा हो तो बावफ़ा हो जाएगा

सीख ली उसने मौसम की अदा
हँसते-हँसते ही वो खफ़ा हो जाएगा

चाहतें अपनी हमने तो कर दी निसार
क्या पता था वो बेवफ़ा हो जाएगा

दर्द मिलते रहें तो न घबरा ऐ दिल
दर्द भी तो कभी दवा हो जाएगा

आप कहें तो कभी मुझको अपना नदीश
दिल क्या ईमान भी आपका हो जाएगा

चित्र साभार- गूगल

तेरी आँखों में


राह  तकता ही  रहा  ख़्वाब सुनहरा कोई
नींद पे  मेरी लगा  कर  गया  पहरा  कोई

ढूंढती है मेरे एहसास की तितली फिर से
तेरी आँखों  में,  मेरी याद का सहरा कोई

चीखती है मेरी नज़र से ख़ामोशी अब तो
आईना  दे के  मुझे  ले  गया  चेहरा कोई

जो रख दिए हैं कदम, राहे-मोहब्बत में नदीश
फिर जहां लाख सदा दे, नहीं ठहरा कोई

चित्र साभार- गूगल

गाँव में यादों के


नज़र को आस नज़र की है मैकशी के लिये
तड़प रहे हैं बहुत आज हम किसी के लिये

नहीं लगता है ये मुमकिन मुझे सफ़र तनहा
हमसफ़र चाहिये मुझको भी ज़िन्दगी के लिये

गाँव में यादों के छाई है जो सावन की घटा
बरस ही जाये तो अच्छा है तिश्नगी के लिये

धूप रख के भी अंधेरों से वफ़ा की हमने
आज दिल भी जलाएंगे रौशनी के लिये

ढले तो आँख से आंसू, मगर ग़ज़ल की तरह
उम्र नदीश की गुजरे तो शायरी के लिये
चित्र साभार- गूगल

किस तरह बदलते हैं


टूटा  मेरी  वफ़ा का भरम देखते देखते
झूठे  हुए  वादा ओ कसम देखते देखते

किस तरह बदलते हैं अपना कहने वाले लोग
जीते  हैं  तमाशा  ये  हम  देखते देखते

चर्चा रस्मो-रवायत का अब करें किससे भला
बदला है किस तरह से अदम देखते देखते

होते हैं रोज़ मोज़िजा कैसे कैसे प्यार में
खुशियाँ बनने लगी हैं अलम देखते देखते

इक बार जो आई नदीश लब पे तबस्सुम
बढ़ते गए ज़िन्दगी के सितम देखते देखते

चित्र साभार- गूगल

ओस की बूंदों से

सिर्फ इतना ही यहां तंग नज़र जानते हैं
दर-ओ-दीवार बनाकर उसे घर जानते हैं

कोई परवाह है तूफां की न ही डर छालों का
हम फ़क़त अपना जो मक़सदे-सफ़र जानते हैं

ओस की बूंदों से जिनके बदन झुलसते हैं
उनका दावा कि वो तासीर-ए-शरर जानते हैं

वहीं से ज़ख्म मुहब्बत के मिले हैं हमको
लोग जिस जगह को उल्फ़त का नगर जानते हैं

आब की तह में किनारे मिला करते हैं नदीश
देखने वाले जुदा उनको मगर जानते हैं


चित्र साभार- गूगल

दिल के अनुसार नहीं होता



इन्कार नहीं होता इकरार नहीं होता
कुछ भी तो यहाँ दिल के अनुसार नहीं होता

लेगी मेरी मोहब्बत अंगड़ाई तेरे दिल में
कोई भी मोहब्बत से बेज़ार नहीं होता

अब शोख़ अदाओं का जादू भी चले दिल पर
ऐसे तो दिलबरों का सत्कार नहीं होता

कैसे भुला दूँ, तुझसे, मंज़र वो बिछड़ने का
एहसास ज़िन्दगी का हर बार नहीं होता

सुनकर सदायें दिल की फ़ौरन ही चले आना
अब और नदीश हमसे इसरार नहीं होता

चित्र साभार- गूगल

पांव से कह रहा है


गैर से ही नहीं खुद से भी छले मिलते हैं
लोग चेहरे पे कई चेहरे मले मिलते हैं

मैंने एहसास के दरीचे से देखा जब भी
फूल के पेड़ भी कांटों से फले मिलते हैं

पांव से कह रहा है देख, रास्ता तेरा
राह में प्यार की, तलवे तो जले मिलते हैं

अब ठहरती ही नहीं सीख मुहब्बत की कहीं 
लोग दिल से बुरे, लफ़्ज़ों से भले मिलते हैं

बात वो ही किया करते हैं दूरियों की नदीश
बांध कर हाथ भी पीछे, जो गले मिलते हैं

चित्र साभार- गूगल


याद के पंछी


पलक की सीपियों में अश्क़ को गौहर बनाता हूँ
मैं तन्हाई की दुल्हन के लिए जेवर बनाता हूँ

कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस की पंखुडियां 
तेरे वादों को मैं तस्वीर में अक्सर बनाता हूँ

मेरी मंज़िल की राहों में खड़ा है आसमां तू क्यूँ
ज़रा हट जा मैं अपने हौसले को पर बनाता हूँ

ज़ेहन में चहचहातें हैं तुम्हारी याद के पंछी
मैं जब भी सोच में कोई हसीं मंज़र बनाता हूँ

चित्र साभार- गूगल