ग़ज़ल की शबनमी छाँव में एक ठहराव...

मेरी तस्वीर

तेरे बगैर

बिखर जाने दे

दर्द का एक पल

अच्छा है कि

शहर में तेरे

मुद्दतों से जिसे

दर्द का लम्हा

यादों की टिमटिम

मंज़र बहार के

गुलों की राह के

कहूँ किसको

ये आँखें जब

तहखाने नींद के

ख़ुश्बू आँखों में

कुछ नहीं

जलते शहर से

सरापा दास्तां हूँ

चाँद खिल गया