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कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस

न कोई मंजिल के निशां

है ऐसा या वैसा या जैसा नदीश

सारी दुनिया भुला दी

जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी

हर लम्हां गुजरता है

आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे

छिपा सकते हो कब तक

कैसे यक़ीन उसको हो

इतनी यादों की दौलत

आँखों में एक ख्वाब चमकने लगता है

निचोड़ के मेरी पलक को

तुम्हारे हिज़्र में

ठहरी है ग़म की झील में

अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली

मंज़र दिल का उदास

ख्यालों में तेरे खोया है

हम तुम्हारी यादों से .

चांदनी की तरह