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बहारें अब न आएंगी

झील

इज़्तिराब देखता हूँ

बहार का लुत्फ़

रंग मुहब्बत का

पंखुड़ी गुलाब की

महकती रही ग़ज़ल

सुनहरा मौसम

कह सकते हो

दूर मुझसे न रहो तुम

परिन्दे ख़्वाब के

फूल खिला के आया हूँ

जब से बसे हो आँख में