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Showing posts from 2017

सरापा दास्तां हूँ

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यहां पर भी हूँ मैं, मैं ही वहां हूँ ठिकाना है बदन, मैं लामकां हूँ
हमारा साथ है कुछ इस तरह से तड़प और दर्द तू है, मैं फुगां हूँ
हुई है ग़म से निस्बत जब से मेरी है सच, न ग़मज़दा हूँ न शादमां हूँ
मुझे पढ़ लो मुझे महसूस कर लो मैं अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में निहां हूँ
न है उन्वान, न ही हाशिया है मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ
नदीश आओ ज़माना मुझमें देखो मैं नस्ल-ए-नौ की मंज़िल का निशां हूँ
चित्र साभार- गूगल

चांदनी के फूल

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झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल 
भटके न  राहगीर  कोई  राह  प्यर   की रक्खें हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल 
दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया झरने लगे हैं  आँख से भी   चांदनी के फूल 
बोएंगे मुसलसल जो सभी दुश्मनी के बीज देखेगी कैसे नस्ल कल की दोस्ती के फूल 
हस्ती को अपनी पहले मुकम्मल तो कीजिये खिलते हैं बहुत मुश्किलों से आदमी के फूल 
अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम हर सांस महकती है लिए बन्दिगी के फूल 
है तसफिये कि ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात खिलते हैं  दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल 
छूकर गुले-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी होंठो  पे गुनगुना  रहे   हैं शायरी के फूल 
भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी नदीश
अशआर तेरे आये हैं  लेके  सदी के फूल

चित्र साभार-गूगल

तुम न होगे तो

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तुम न होगे तो यूँ भी क्या हो जाएगा कुछ नए ज़ख्मों से राब्ता हो जाएगा
उसको भी तासीरे-उल्फ़त देगी बदल बेवफ़ा हो तो बावफ़ा हो जाएगा
सीख ली उसने मौसम की अदा हँसते-हँसते ही वो खफ़ा हो जाएगा
चाहतें अपनी हमने तो कर दी निसार क्या पता था वो बेवफ़ा हो जाएगा
दर्द मिलते रहें तो न घबरा ऐ दिल दर्द भी तो कभी दवा हो जाएगा
आप कहें तो कभी मुझको अपना नदीश दिल क्या ईमान भी आपका हो जाएगा
चित्र साभार- गूगल

तेरी आँखों में

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राह  तकता ही  रहा  ख़्वाब सुनहरा कोई नींद पे  मेरी लगा  कर  गया  पहरा  कोई
ढूंढती है मेरे एहसास की तितली फिर से तेरी आँखों  में,  मेरी याद का सहरा कोई
चीखती है मेरी नज़र से ख़ामोशी अब तो आईना  दे के  मुझे  ले  गया  चेहरा कोई
जो रख दिए हैं कदम, राहे-मोहब्बत में नदीश फिर जहां लाख सदा दे, नहीं ठहरा कोई
चित्र साभार- गूगल

देखते-देखते

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टूटा  मेरी  वफ़ा का भरम देखते देखते झूठे  हुए  वादा ओ कसम देखते देखते
किस तरह बदलते हैं अपना कहने वाले लोग जीते  हैं  तमाशा  ये  हम  देखते देखते
चर्चा रस्मो-रवायत का अब करें किससे भला बदला है किस तरह से अदम देखते देखते
होते हैं रोज़ मोज़िजा कैसे कैसे प्यार में खुशियाँ बनने लगी हैं अलम देखते देखते
इक बार जो आई नदीश लब पे तबस्सुम बढ़ते गए ज़िन्दगी के सितम देखते देखते
चित्र साभार- गूगल

ओस की बूंदों से

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सिर्फ इतना ही यहां तंग नज़र जानते हैं दर-ओ-दीवार बनाकर उसे घर जानते हैं
कोई परवाह है तूफां की न ही डर छालों का हम फ़क़त अपना जो मक़सदे-सफ़र जानते हैं
ओस की बूंदों से जिनके बदन झुलसते हैं उनका दावा कि वो तासीर-ए-शरर जानते हैं
वहीं से ज़ख्म मुहब्बत के मिले हैं हमको लोग जिस जगह को उल्फ़त का नगर जानते हैं
आब की तह में किनारे मिला करते हैं नदीश देखने वाले जुदा उनको मगर जानते हैं

चित्र साभार- गूगल

दिल के अनुसार नहीं होता

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इन्कार नहीं होता इकरार नहीं होता कुछ भी तो यहाँ दिल के अनुसार नहीं होता
लेगी मेरी मोहब्बत अंगड़ाई तेरे दिल में कोई भी मोहब्बत से बेज़ार नहीं होता
अब शोख़ अदाओं का जादू भी चले दिल पर ऐसे तो दिलबरों का सत्कार नहीं होता
कैसे भुला दूँ, तुझसे, मंज़र वो बिछड़ने का एहसास ज़िन्दगी का हर बार नहीं होता
सुनकर सदायें दिल की फ़ौरन ही चले आना अब और नदीश हमसे इसरार नहीं होता
चित्र साभार- गूगल

राह में प्यार की

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गैर से ही नहीं खुद से भी छले मिलते हैं लोग चेहरे पे कई चेहरे मले मिलते हैं
मैंने एहसास के दरीचे से देखा जब भी फूल के पेड़ भी कांटों से फले मिलते हैं
पांव से कह रहा है देख, रास्ता तेरा राह में प्यार की, तलवे तो जले मिलते हैं
अब ठहरती ही नहीं सीख मुहब्बत की कहीं  लोग दिल से बुरे, लफ़्ज़ों से भले मिलते हैं
बात वो ही किया करते हैं दूरियों की नदीश बांध कर हाथ भी पीछे, जो गले मिलते हैं

चित्र साभार- गूगल

याद के पंछी

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पलक की सीपियों में अश्क़ को गौहर बनाता हूँ मैं तन्हाई की दुल्हन के लिए जेवर बनाता हूँ
कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस की पंखुडियां  तेरे वादों को मैं तस्वीर में अक्सर बनाता हूँ
मेरी मंज़िल की राहों में खड़ा है आसमां तू क्यूँ ज़रा हट जा मैं अपने हौसले को पर बनाता हूँ
ज़ेहन में चहचहातें हैं तुम्हारी याद के पंछी मैं जब भी सोच में कोई हसीं मंज़र बनाता हूँ

चित्र साभार- गूगल

ख़्वाब रखता हूँ

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फैसलों का तेरे ऐ ज़िन्दगी हिसाब रखता हूँ। गुज़िश्ता हर लम्हें की तेरे इक किताब रखता हूँ
देखकर चुप हूँ तेरी चश्मे-परेशां ऐ वक़्त वगरना तेरे हर सवाल का जवाब रखता हूँ
दोस्ती में सुना है अब कहीं वफ़ा ही नहीं बात ये है कि मैं भी थोड़े से अहबाब रखता हूँ
 उम्मीदो-अश्क़ से बावस्ता हैं आँखें उससे शिकस्ता ही सही वफ़ा का मैं जो ख़्वाब रखता हूँ
कोई ख़्वाहिश कोई हसरत नहीं खुशी की नदीश उतर के देख दिल में कितने मैं अज़ाब रखता हूँ

चित्र साभार-गूगल

इश्क़ की राह

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मिरे वज़ूद को दिल का जो घर दिया तूने इश्क़ की राह को आसान कर दिया तूने
ख़लिश मैं ओस की महसूस करूं फूलों में दिल के एहसास को कैसा असर दिया तूने
रहेगी याद ये सौग़ात उम्र भर तेरी सिर्फ़ आंसू ही सही कुछ मगर दिया तूने
न कोई नक्स-ए-पा है न कोई मंजिल के निशां मेरी हयात को ये रहगुज़र दिया तूने
ख़ुद अपने घर में ही मेहमान हो गया है नदीश मेरे एहसास को ऐसा सफ़र दिया तूने
चित्र साभार-गूगल

सिवा प्यार के

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भला है बुरा है, है अपनी जगह मेरा फ़ैसला है, है अपनी जगह
ज़माना भले बेवफ़ा हो मगर अभी भी वफ़ा है, है अपनी जगह
नहीं प्यार कुछ भी सिवा प्यार के तेरा सोचना है, है अपनी जगह
नज़ारे हसीं लाख दुनिया के हों सनम की अदा है, है अपनी जगह
मुलाकातें उनसे हुईं तो बहुत मगर फ़ासला है, है अपनी जगह
रहे कोशिशें दोस्ती की सदा ये शिकवा-गिला है, है अपनी जगह
है ऐसा या वैसा या जैसा नदीश वो सबसे जुदा है, है अपनी जगह
चित्र साभार-गूगल

सारी दुनिया भुला दी

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सांसों ने चाहा ओ' दिल ने दुआ दी मिला साथ तेरा ज़िन्दगी मुस्कुरा दी
सोचा था भुलाऊंगा यादों को तेरी मगर याद ने सारी दुनिया भुला दी
ग़ज़ब कर दिया मेरे एहसास ने भी मुहब्बत को तन्हाईयों की सज़ा दी
जिससे भी सीखा हो फूलों ने हँसना मगर चाहतों को तुम्हीं ने हवा दी
वही कह रहे हैं मुझे बेवफ़ा अब जिन्हें तोहफ़े में हम ही ने वफ़ा दी
उसकी आरज़ू में नदीश हमने अपनी उम्र ये सारी तन्हा-तन्हा बिता दी
चित्र साभार-गूगल

आईना बन जायेगा

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तू अगर दिल की सुनेगा बावफ़ा बन जायेगा आज के इस दौर में ये ही सज़ा बन जायेगा
इश्क़ के बारे में कुछ मत पूछ ये ही जान ले इश्क़ जिस पत्थर को छू ले वो खुदा बन जायेगा
तोड़ने वाले मेरा दिल, सोच ले पहले जरा दिल नहीं है कोई बुत जो दूसरा बन जायेगा
ग़म अगर मेरे बिखर जाने का तुझको है नदीश मैं संवर जाऊंगा गर तू आईना बन जायेगा
चित्र साभार-गूगल

ठंडी हवा की आँच

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जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 
अश्क़ों के शरारे* समेट कर तमाम रोज ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा* की आंच
सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून  लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा* की आँच 
सौदागरी* नहीं है, ये है ज़िन्दगी मेरी  रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 
महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं  लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच


दरिया ये कोई आग का आई है करके पार पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 
क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच
लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल  झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच

चित्र साभार-गूगल +÷÷÷÷÷+ शरारे- अंगार मिज़ा- पलक राहत-फ़ज़ा- सुकून का माहौल सौदाग़री- व्यापार अना- अहंकार

गुलाब है ज़िन्दगी

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कहीं कांटा कहीं गुलाब है ज़िन्दगी हाँ मुहब्बत पे शबाब है ज़िन्दगी
कोई न देखे तेरा चेहरा कभी दौर-ए-हाज़िर में नकाब है ज़िन्दगी
तू नहीं तो कुछ नहीं मेरा यहाँ साथ तेरे लाजवाब है ज़िन्दगी
झूठ को कह ले जो भी सच की तरह आज उसकी कामयाब है ज़िन्दगी
किसने पायी है उम्र कितनी यहाँ पल दो पल का हुबाब है ज़िन्दगी
हो सके तो वक़्त को पढ़िए नदीश सोचकर देखें जवाब है ज़िन्दगी
चित्र साभार-गूगल

ख़्वाब की गलियों में

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यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे ज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे 
एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ  ख़्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 


बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर  इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे 
रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर  इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे 
आ गया एहसास के फिर चीथड़े ओढ़े हुए  दर्द का लम्हा जिसे हम मुल्तवी करते रहे 
दिल्लगी दिल कि लगी में फर्क कितना है नदीश  दिल लगाया हमने जिनसे दिल्लगी करते रहे


चित्र साभार-गूगल
मुसलसल- लगातार, निरंतर मुल्तवी- टालना

चाहते क्या हो

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भला मायूस हो क्यूँ आशिकी से चाहते क्या हो? अभी तो आग़ाज़ ही है फिर अभी से चाहते क्या हो?
कहाँ हर आदमी दिल चीर के तुमको दिखायेगा बताओ यार तुम अब हर किसी से चाहते क्या हो?
फ़क़त हों आपके आँगन में ही महदूदो-जलवागर घटा से धूप से और चांदनी से चाहते क्या हो?
वफायें रोक लेंगी तुमको मेरी, है यकीं मुझको  दिखाकर इस तरह की बेरुखी से चाहते क्या हो?
छिपा सकते हो कब तक खुद से खुद को तुम नदीश चुराकर आँख अपनी आरसी से चाहते क्या हो?
चित्र साभार- गूगल
महदूदो-जलवागर- सीमित और रौशन

दीदार सनम का

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खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वो अब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वो
जिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझको खुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वो
क्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ में मुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वो
पहुँचेगा हकीकत तक दीदार कब सनम का सपनों के मुसाफिर की मंज़िल रहा है वो
कैसे यक़ीन उसको हो दिल के टूटने का शीशे की तिज़ारत में शामिल रहा है वो
तूफां में घिर गया हूँ मैं दूर होके उससे  कश्ती का ज़िन्दगी की साहिल रहा है वो
ता उम्र समझता था जिसको नदीश अपना गैरों की तरह आकर ही  मिल रहा है वो


चित्र साभार- गूगल
मुंसिफ़- न्याय करने वाला तिज़ारत- व्यापार

यादों की दौलत

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यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है
खुद को अलग करोगे कैसे, दर्द से बोलो दाग, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है
मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है
अश्क़ सरापा ख़्वाब मेरे कहते हैं मुझसे ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है
पलकों पर ठहरे आंसू पूछे है मुझसे कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है
वज्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है
इतनी यादों की दौलत हो गयी इकट्ठी अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है
चित्र साभार- गूगल

जुगनू, खुश्बू, चाँद-सितारे, बादल, गुलशन और फिज़ा

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दिल मेरा जब लेकर तेरा नाम धड़कने लगता है  वीरां-वीरां आँखों में एक ख्वाब चमकने लगता है 
साँसों की ही खातिर तुझको माँगा है इस जीवन ने  तुझको न सोचे तो ये दिल यार मचलने लगता है 
चुभ जाते हैं अश्क़ों के कांटे यादों के बिस्तर पे  नींदों का पतझर आकर बेज़ार दहकने लगता है 
जुगनू, खुश्बू, चाँद-सितारे, बादल, गुलशन और फिज़ा  जब तुम मेरे पास न हो तो माहौल अखरने लगता है 
कैसे हाल सुनाये अपने दिल का तुमको कहो नदीश  आँखों से आंसू बनकर ये दर्द छलकने लगता है

चित्र साभार- गूगल

निचोड़ के मेरी पलक को

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अपने होने के हर एक सच से मुकरना है अभी ज़िन्दगी है तो कई रंग से मरना है अभी
तेरे आने से सुकूं मिल तो गया है लेकिन सामने बैठ ज़रा मुझको संवरना है अभी
ज़ख्म छेड़ेंगे मेरे बारहा पुर्सिश वाले ज़ख्म की हद से अधिक दर्द उभरना है अभी
निचोड़ के मेरी पलक को दर्द कहता है मकीन-ए-दिल हूँ मैं और दिल में उतरना है अभी
आज उसने किया है फिर से वफ़ा का वादा इम्तिहानों से मुझे और गुजरना है अभी
बाद मुद्दत के मिले तुम तो मुझे याद आया  ज़ख्म ऐसे हैं कई जिनको कि भरना है अभी
हुआ है ख़त्म जहाँ पे सफ़र नदीश तेरा  वो गाँव दर्द का है और ठहरना है अभी
चित्र साभार- गूगल
बारहा- बार-बार पुर्सिश- हालचाल जानना मकीन-ए-दिल- दिल का निवासी

तुम्हारे हिज़्र में

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गिर रही है आँख से शबनम तुम्हारे हिज़्र में एक ही बस एक ही मौसम तुम्हारे हिज़्र में
क़तरे-क़तरे में शरारों सी बिछी है चांदनी  बन गयी है हर ख़ुशी मातम तुम्हारे हिज़्र में
आईना-ओ-धूप के बिन अक्स न साया मेरा किस क़दर तनहा हूँ मैं हमदम तुम्हारे हिज़्र में
खो गयी है अब नज़र की तिश्नगी जाने कहाँ  अश्क़ में डूबा है ये आलम तुम्हारे हिज़्र में
दे भी जाओ अब सनम आकर सुकूं दिल को मेरे या बता जाओ करें क्या हम तुम्हारे हिज़्र में
तुम नहीं तो सांस भी भारी लगे है बोझ सी यूँ ही निकलेगा लगे है दम तुम्हारे हिज़्र में
फ़िक्र-ए-दुनिया है न खुद की है ख़बर कोई मुझे अब ख़ुशी है न ही कोई ग़म तुम्हारे हिज़्र में
फूल उम्मीदों के सारे, आज कांटे बन गए  हर क़दम पतझर का है मौसम तुम्हारे हिज़्र में
एक-एक लम्हा लगे है अब क़यामत सा नदीश ख़्वाब भी होने लगे हैं नम तुम्हारे हिज़्र में
चित्र साभार- गूगल
हिज़्र- जुदाई, विरह शरारों- अंगारों तिश्नगी- प्यास

ग़म की झील में

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रुख़ से ज़रा नक़ाब उठे तो ग़ज़ल कहूं  महफ़िल में इज़्तिराब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
इस आस में ही मैंने खराशें क़ुबूल की  काँटों से जब गुलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए  तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
अंगड़ाईयों को आपकी मोहताज है नज़र  सोया हुआ शबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
दर्दों की इंतिहा से गुज़र के जेहन में जब  जज्बों का इन्किलाब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
तारे समेटने के लिए शोख़ फ़लक से  धरती से माहताब उठे तो ग़ज़ल कहूं 
ठहरी है ग़म की झील में आँखें नदीश की  यादों का इक हुबाब उठे तो ग़ज़ल कहूं
चित्र साभार- गूगल

ख़ुदकुशी कर ली

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दूर हमने यूँ तीरगी कर ली
जला के दिल को रौशनी कर ली
दोस्ती है फ़रेब जान के ये
जो मिला उससे दुश्मनी कर ली
ज़िन्दगी कैसे रहबरी करती
मौत ने मेरी रहज़नी कर ली
इसलिए हो गए खफ़ा आंसू
सिर्फ उम्मीद-ए-ख़ुशी कर ली

गिर गए आईने की आँखों से
अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली
रूठ के जाना किसी का ऐ नदीश
रूह ने जैसे बेरुख़ी कर ली


चित्र साभार-गूगल

मंज़र दिल का उदास

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मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता
तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता
जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता
जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता
ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता चित्र साभार- गूगल

बुझी आँखों में

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वफ़ा का फिर सिला धोखा रहा है बस अपना तो यही किस्सा रहा है


उन्ही जालों में खुद ही फंस गया अब जिन्हें रिश्तों से दिल बुनता रहा है


समेटूं  जीस्त के सपने नज़र में मेरा अस्तित्व तो बिखरा रहा है


बुझी आँखों में जुगनू टिमटिमाये कोई भूला हुआ याद आ रहा है


ख्यालों में तेरे खोया है इतना  नदीश हर भीड़ में तनहा रहा है चित्र साभार- गूगल

तुम्हारी यादों से .

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पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं
जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं
फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं
फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं
.
जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल
पोशीदा- छिपी हुई सायबां- छांव कहकशां- ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी

चांदनी की तरह

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प्यार हमने किया जिंदगी की तरह आप हरदम मिले अजनबी की तरह
मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह
मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह
दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह
हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह
आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं सोचकर आपको शायरी की तरह
ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह
काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह
याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश तीरगी में हुई रौशनी की तरह