तुम्हारी यादों से .


पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं
लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं

जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं

फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं

फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो
जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं

.
जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की
हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल

पोशीदा- छिपी हुई
सायबां- छांव
कहकशां- ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी

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19 Comments

  1. वाह !
    अति उत्तम !
    कमाल का लिखते हैं आप लोकेश जी।
    बधाई एवं शुभकामनाऐं।

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  2. वाह्ह्ह.....लाज़वाब गज़ल लोकेश जी।
    बेहद सुंदर👌

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  3. फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
    क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं
    बेहद खूबसूरत !

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  4. आदरणीय लोकेश जी बहुत उम्दा शेरों से सजी रचना !!!!!! सादर --

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  5. बहुत ही ख़ूबसूरत शेर हैं इस ग़ज़ल के ।।।

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  6. बहुत ही सुंदर।

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  7. जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
    वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं!!!!!!!!
    बहुत सुंदर आदरनीय लोकेश जी | मन के अत्यंत कोमल भावों को बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत करने में आपका कोई जवाब नहीं | मेरी हार्दिक शुभकामनायें और बधाई स्वीकार हो | सादर --

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  8. मज़ा आ गया फिर से आपकी खूबसूरत ग़ज़ल पढ़ के ....
    भावनाओं का सैलाब शब्द बन गए ...

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  9. कमाल की गजल...एक से बढकर एक शेर...
    वाह!!!

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