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Showing posts from 2018

ख़्वाबों का मौसम

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कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी आँखों में फिर से महकने लगे हैं
उमंगों की सूखी नदी के किनारे आशाओं की नाव टूटी पड़ी है तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है
ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं
हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये
पाकर के अपने ख्यालों में तुमको अरमान दिल के मचलने लगे हैं
ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है
भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं
चित्र साभार- गूगल

साँसों का साथ

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ये करिश्मा मोहब्बत में होते देखा लब पे हँसी आँख को रोते देखा
गुजरे है मंज़र भी अजब आँखों से
साहिल को कश्तियां डुबोते देखा
* * *
पानी से है बिल्कुल खाली सूरत
लोग लिये फिरते हैं जाली सूरत
खाते हैं अक्सर फ़रेब चेहरे से
देखकर सब ये भोली-भाली सूरत
* * *
तेरे ही साथ को साँसों का साथ कहता हूँ
तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुजरे जो चंद पल मेरे
बस उन्हीं लम्हों को सारी हयात कहता हूँ
* * * चित्र साभार- गूगल
हयात-जीवन कायनात- दुनिया

चुपके-चुपके

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व्याकुल हो जब भी मन मेरा तब-तब गीत नया गाता है आँखों में इक सपन सलोना  चुपके-चुपके आ जाता है
जीवन के सारे रंगों से  भीग रहा है मेरा कण-कण मुझे कसौटी पर रखकर ये समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण
गड़ता है जो भी आँखों में समय वही क्यों दिखलाता है
जाने किस पल हुआ पराया वो भी तो मेरा अपना था  रिश्ता था कच्चे धागों का मगर टूटना इक सदमा था
घातों से चोटिल मेरा मन आज बहुत ही घबराता है
जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका  नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती मिलकर बेबस-बेकस चीटी इक ताकतवर भीड़ बनती
छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो यही तो जीवन कहलाता है


 चित्र साभार- गूगल

मेरी आँखों को

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ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें
तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें
ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें
फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें
तेरी ख़ुश्बू से महकता है प्यार का गुलशन सींच के अश्क़, बीज याद के बोई आँखें
हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें
चित्र साभार- गूगल

ज़िन्दगी का मौसम

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तीन मुक्तक

उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया, हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल को बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम
***
प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी एक निगाह से बेताब दिल हुआ
हज़ार गुल दिल मे ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ
***
पल-पल बोझल था मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के जोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात ***
चित्र साभार- गूगल

शादाब- खुशियों भरा

ग़म की रेत पे

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यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है
आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है

ख़ुद को अलग करोगे कैसे दर्द से, बोलो
दाग़, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है

अश्क़ सरापा* ख़्वाब मेरे, कहते हैं मुझसे
ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है

मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है
फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है

पलकों पर ठहरे आंसू, पूछे है मुझसे
कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है

वज़्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं
मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है

इतनी यादों की दौलत हो गई इकट्ठी
अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है 

चित्र साभार- गूगल

*सरापा- सर से पाँव तक

तेरा ख़याल

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याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं
तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं
इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
चित्र साभार- गूगल

अश्क़ों का बादल

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वीरानियों का वो आलम है दिल में मर्ग-ए-तमन्ना का मातम है दिल में
ठहरा हुआ है अश्क़ों का बादल सदियों से बस एक मौसम है दिल में
धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में
मुझको पुकारा है तूने यकीनन ये दर्द शायद तभी कम है दिल में
हँस कर हँसी ने हँसी में ये पूछा बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में
चित्र साभार- गूगल
मर्ग-ए-तमन्ना- तमन्ना की मौत सफ़ह- पृष्ठ, पेज

मेरी तस्वीर

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ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना
बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना 
तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना
ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना
ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना
चित्र साभार- गूगल
तल्ख़- कड़वा आईना-ए-हयात- जीवन दर्पण

तेरे बगैर

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किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है हर वक़्त तू भी तो खफ़ा सा, खैर रहा है
हासिल यही है तज़ुर्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे किरदार तो अपनों में मेरा ग़ैर रहा है
मुझको बहुत अज़ीज़, फ़क़ीरी है मेरी हाँ गुम्बदों के सर पे मेरा पैर रहा है
फिरता रहा बार-ए-अना लिये तमाम उम्र बनके लाश जो पानी में तैर रहा है
पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़ कैसे नदीश ये तेरे बगैर रहा है
चित्र साभार- गूगल
बार-ए-अना- अहंकार का बोझ

ज़िन्दगी

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सैकड़ों खानों में जैसे बंट गई है ज़िन्दगी साथ रह कर भी लगे है अजनबी है ज़िन्दगी
झाँकता हूँ आईने में जब भी मैं अहसास के यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी
न तो मिलने की ख़ुशी है न बिछड़ जाने का ग़म हाय, ये किस मोड़ पे आकर रुकी है ज़िन्दगी
सीख ले अब लम्हें-लम्हें को ही जीने का हुनर कौन जाने और अब कितनी बची है ज़िन्दगी
आख़िरी है वक़्त कि अब तो चले आओ सनम बस तुम्हें ही देखने तरसी हुई है ज़िन्दगी
वस्ल भी है प्यार भी है प्यास भी है जाम भी फिर भी जाने क्यों लगे है अनमनी है ज़िन्दगी
अब कहाँ तन्हाई ओ' तन्हाई का साया नदीश उसके ख़्वाबों और ख़्यालों से सजी है ज़िन्दगी
चित्र साभार- गूगल

बिखर जाने दे

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अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे
मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे
दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं दर्द कोई नया ज़िगर से गुज़र जाने दे
यूँ नहीं होता है इसरार से हमराह कोई गुज़र जायेगा तन्हा ये सफ़र जाने दे
नदीश आयेगा कभी तो हमसफ़र तेरा जहां भी जाये मुंतज़िर ये नज़र जाने दे
चित्र साभार- गूगल
इसरार- आग्रह मुंतज़िर- प्रतीक्षारत

दर्द का एक पल

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बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा लिपट के रास्ते से मेरे तर-ब-तर निकला
खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला
रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को  उसके तहखाने से कटा हुआ शजर निकला
हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे दर्द का एक पल जो ख़ुशियों से बेहतर निकला
चित्र साभार- गूगल

अच्छा है कि

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रखता नहीं है निस्बतें  किसी  से आदमी रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी
धोखा, फ़रेब,  खून-ए-वफ़ा  रस्म हो गए डरने लगा  है अब  तो  दोस्ती से आदमी
मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से  इस तरह मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी
शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ ख़ुश  भी  नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी
हासिल है रंजिशों का तबाही-ओ-तबाही रहता है मगर फिर भी दुश्मनी से आदमी
अपना पराया भूल के सब एक हो यहां अच्छा है कि मिल के रहे सभी से आदमी
अच्छा है कि नदीश मुकम्मल नहीं है तू पाता है कुछ नया किसी कमी सी आदमी
चित्र साभार- गूगल
÷÷÷÷÷ निस्बत- अपनापन आजिज़ी- बेमन, बेरुख़ी मुकम्मल- पूर्ण

आस की छत

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कड़ी है धूप और न साया-ए-शजर यारों न हमसफ़र है, उसपे ज़ीस्त का सफ़र यारों
न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों
आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों
बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों
मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों
चित्र साभार- गूगल
साया-ए-शजर- पेड़ की छांव ज़ीस्त- जीवन, ज़िन्दगी चराग़-ए-अश्क़- आंसू के दीये दरो-दीवारे-ख़्वाब- ख़्वाब के दरवाजे और दीवार गुले-एहसास- अनुभूति का फूल रक़ीब- प्रेम में प्रतिद्वंद्वी मोतबर- विश्वसनीय, भरोसेमंद मुद्दत- लंबा अंतराल, काफी समय से

शहर में तेरे

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मकानों के दरम्यान कोई घर नहीं मिला शहर में तेरे प्यार का मंज़र नहीं मिला
झुकी जाती है पलकें ख़्वाबों के बोझ से आँखों को मगर नींद का बिस्तर नहीं मिला
सर पे लगा है जिसके इलज़ाम क़त्ल का हाथों में उसके कोई भी खंज़र नहीं मिला
किस्तों में जीते जीते टुकड़ों में बंट गए खुद को समेट लूँ कभी अवसर नहीं मिला
फिरता है दर्द सैकड़ों लेकर यहां नदीश अपनों की तरह से कोई आकर नहीं मिला
चित्र साभार- गूगल

मुद्दतों से जिसे

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दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाये रक्खा इन चराग़ों को हवाओं से बचाये रक्खा
हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी हमने खुद को तेरी यादों में डुबाये रक्खा
तिरे ख़्याल ने दिन भर मुझे सताया है हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाये रक्खा
वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाये रक्खा
उमड़ पड़ा है ये तूफ़ान देखकर तुमको मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाये रक्खा
रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें एक-एक हर्फ़ ने अहसास बनाये रक्खा
चित्र साभार- गूगल
*हर्फ़- अक्षर

कहकशां

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पल भर तुमसे बात हो गई ख़ुशियों की सौग़ात हो गई
दुश्मन है इन्सां का इन्सां कैसी उसकी जात हो गई
आँखों में है एक कहकशां अश्कों की बारात हो गई
वक़्त, वक़्त ने दिया ही नहीं बातें अकस्मात हो गई
जख़्म मिले ता-उम्र जो नदीश रिश्तों की सौग़ात हो गई
चित्र साभार- गूगल
*कहकशां- आकाशगंगा, गैलेक्सी

सपने, आँखें, नींद

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समझदार तो सिर्फ़ सियासत करते हैं पागल हैं जो लोग, मुहब्बत करते हैं
ये तो सोचा नहीं दोस्ती में हमने आगे चलकर दोस्त अदावत करते हैं
दिल से उसे भुला दें, गर है शर्त यही सांसों की हम रद्द ज़मानत करते हैं
मिलता है अश्क़ों को देश निकाला जब सपने, आँखें, नींद बग़ावत करते हैं
कोना तेरी यादों का महफूज़ रखा इतनी दिल के ज़ख़्म रियायत करते हैं
अपनी तुर्बत से अब चलो नदीश उठो  मिट्टी से वो रोज़ शिकायत करते हैं
चित्र साभार- गूगल

तुर्बत- कब्र

दर्द का लम्हा

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यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे ज़िन्दगी भर  आरज़ू-ए-ज़िन्दगी  करते  रहे 
एक  मुद्दत  से  हक़ीक़त  में नहीं आये यहाँ  ख़्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 
बड़बड़ाना  अक्स  अपना आईने में देखकर  इस तरह ज़ाहिर वो अपनी  बेबसी करते रहे 
रोकने की कोशिशें तो खूब कीं पलकों ने पर  इश्क़ में  पागल थे  आँसू  ख़ुदकुशी करते रहे
आ गया एहसास के  फिर चीथड़े  ओढ़े  हुए  दर्द  का  लम्हा  जिसे  हम  मुल्तवी करते रहे
दिल्लगी, दिल की लगी में फर्क कितना है नदीश  दिल लगाया हमने  जिनसे  दिल्लगी  करते रहे
चित्र साभार- गूगल
मुल्तवी- टालना

यादों की टिमटिम

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बनकर तेरी यादों की ख़ुश्बू आये हैं दर्द के कुछ कस्तूरी आहू आये हैं
भेजा है पैग़ाम तुम्हारे ख़्वाबों ने बनकर क़ासिद आँख में आंसू आये हैं
रात अमावस की औ' यादों की टिमटिम ज्यों राहत के चंचल जुगनू आये हैं
महका-महका हर क़तरा है मेरे तन का हम जब से तेरा दामन छू आये हैं
जब भी बादल काले-काले दिखे नदीश ज़हन में बस तेरे ही गेसू आये हैं
चित्र साभार- गूगल
आहू- मृग, हिरण क़ासिद- पत्रवाहक, डाकिया गेसू- ज़ुल्फ़, बाल

मंज़र बहार के

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रस्ते तो ज़िन्दगी के साज़गार बहुत थे खुशियों को मगर हम ही नागवार बहुत थे
बिखरे हुए थे चार सू मंज़र बहार के बिन तेरे यूँ लगा वो सोगवार बहुत थे
ये जान के भी अहले-जहां में वफ़ा नहीं दुनिया की मोहब्बत में गिरफ्तार बहुत थे
थी नींद कैद, आंसुओं की ज़द में रात भर आँखों में चंद ख़्वाब बेक़रार बहुत थे
झुलसे मेरी वफ़ा के पांव आख़िरश नदीश या रब तेरे यक़ीन में शरार बहुत थे
चित्र साभार- गूगल
साज़गार- अनुकूल नागवार- अप्रिय सोगवार- दुखी सू- दिशा

ख़्वाबों को

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तूफ़ान में कश्ती को उतारा नहीं होता उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता
ये सोचता हूँ कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी दर्दों का जो है गर वो सहारा नहीं होता
मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता
बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता
महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की जिनको भी दर्दे-ग़ैर गवारा नहीं होता
उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे आँखों मे कोई और नज़ारा नहीं होता
महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश जो साथ तेरे हमने गुज़ारा नहीं होता
चित्र साभार- गूगल

काफ़िले दर्द के

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जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं  काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं
तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी  अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं
किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं
इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं
देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं
बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं
खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं
बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं
चित्र साभार-गूगल

दर्द का मौसम

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कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है
दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है
तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है
न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है
जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है
ग़मों की दास्तां किसको सुनाता मैं नदीश न हमनवां है, न हमदम दिखाई देता है
चित्र साभार- गूगल

आँख में ठहरा हुआ

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वस्ल की शब का है मंज़र आँख में ठहरा हुआ एक सन्नाटा है सारे शहर में फैला हुआ
दोस्ती-ओ-प्यार की बातें जो की मैंने यहाँ किस कदर जज़्बात का फिर मेरे तमाशा हुआ
क्यों मैं समझा था सभी मेरे हैं औ' सबका हूँ मैं सोचता हूँ जाल में रिश्तों के अब उलझा हुआ
फुसफुसा कर क्या कहा जाने ख़ुशी से दर्द ने आंसुओं के ज़िस्म का हर ज़ख्म है सहमा हुआ
रिस रही थी दर्द की बूंदें भी लफ़्ज़ों से नदीश घर मेरे अहसास का था इस कदर भीगा हुआ
चित्र साभार-गूगल



मगर चाहता हूँ

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मुहब्बत में अपनी असर चाहता हूँ वफ़ा से भरी हो नज़र चाहता हूँ
तेरा दिल है मंज़िल मेरी चाहतों की नज़र की तेरी रहगुज़र चाहता हूँ
रहो मेरी आँखों के रु-ब-रु तुम बस ऐसी ही शामो-सहर चाहता हूँ
कभी बांटकर, मेरी तनहाइयों को अगर जान लो, किस कदर चाहता हूँ
वफ़ा दौर-ए-हाज़िर में किसको मिली है मेरे दोस्त तुझसे मगर चाहता हूँ
बनाकर तेरे ख़्वाबों में आशियाँ मैं करूँ ज़िन्दगी को बसर चाहता हूँ
सफ़र में तुझी को नदीश ज़िन्दगी के मैं अपने लिए हमसफ़र चाहता हूँ
चित्र साभार- गूगल

गुलों की राह के

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गुलों की राह के कांटे सभी खफ़ा मिले मुहब्बत में वफ़ा की ऐसी न सज़ा मिले
अश्क़ तो उसकी यादों के करीब होते हैं तिश्नगी ले चल जहां कोई मयकदा मिले
कहूँ कैसे मैं कि इस शहरे-वफ़ा में मुझको जितने भी मिले लोग सभी बेवफ़ा मिले
राह में रोशनी की थे सभी हमराह मेरे अंधेरे बढ़ गए तो साये लापता मिले
आओ तन्हाई में दो-चार बात तो कर लो महफ़िल में तुम हमें मिले तो क्या मिले
क्या यही हासिले-वफ़ा है, परेशान हूँ मैं कुछ तो आंसू, ख़लिश ओ' दर्द के सिवा मिले
आप पे हो किसी का हक़ तो वो नदीश का हो और मुझको ही फ़क़त प्यार आपका मिले
चित्र साभार-गूगल

दर्द से निस्बत

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जो भी ख़लिश* थी दिल में अहसास हो गई है दर्द से निस्बत* मुझे कुछ खास हो गई है
वज़ूद हर खुशी का ग़म से है इस जहां में फिर ज़िन्दगी क्यूं इतनी उदास हो गई है
चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मुहब्बत का दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गई है
शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरुख़ी का यादों में मुहब्बत की अरदास हो गई है
नदीश मुहब्बत में वो वक़्त आ गया है तस्कीन* प्यास की भी अब प्यास हो गई है
चित्र साभार- गूगल
ख़लिश- चुभन निस्बत- लगाव तस्कीन- संतुष्टि

फूल अरमानों का

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कड़ी है धूप चलो छाँव तले प्यार करें  जहाँ ठहर के वक़्त आँख मले प्यार करें 

नज़रिया बदलें तो दुनिया भी बदल जाएगी  भूल के रंजिशें, शिकवे-ओ-गिले प्यार करें 
वफ़ा ख़ुलूस के जज्बों से लबालब होकर फूल अरमानों का जब-जब भी खिले प्यार करें 
दिलों के दरम्यां रह जाये न दूरी कोई  चराग़ दिल में कुर्बतों का जले प्यार करें 

तमाम नफ़रतें मिट जाये दिलों से अपने  तंग एहसास कोई जब भी खले प्यार करें 
कौन अपना या पराया नदीश छोड़ो भी  मिले इंसान जहाँ जब भी भले प्यार करें 

*चित्र साभार-गूगल

कहूँ किसको

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दिल की हर बात मैं कहूँ किसको अपने हालात मैं कहूँ किसको
मैंने खोया तो पा लिया दिल ने जीत कर मात मैं कहूँ किसको
अश्क़ भी याद भी है, ग़म भी है इनमें सौगात मैं कहूँ किसको


अब्र के साथ आँख भी बरसे अबके बरसात मैं कहूँ किसको
तुम नहीं तो नहीं है रंग कोई दिन किसे रात मैं कहूँ किसको
ज़िस्म बेदिल 'नदीश' सबके यहाँ अपने जज़्बात मैं कहूँ किसको

चित्र साभार : गूगल

ये आँखें जब

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धुंधला-धुंधला अक़्स ख़ुशी कम दिखती है ये आँखें जब आईने में नम दिखती है
आ तो गया हमको ग़मों से निभाना लेकिन हमसे अब हर खुशी बरहम दिखती है
आँखों में चुभ जाते हैं ख़्वाबों के टुकड़े नींदों में बेचैनी सी हरदम दिखती है
आसमान कितना रोया है तुम क्या जानों तुमको तो फूलों पे बस शबनम दिखती है
दिल तो टूटा है नदीश का माना लेकिन जाने-ग़ज़ल मेरी तू क्यों पुरनम दिखती है
चित्र साभार-गूगल

तहखाने नींद के

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ये तेरी जुस्तजू से मुझे तज़ुर्बा हुआ मंज़िल हुई मेरी न मेरा रास्ता हुआ
खुशियों को कहीं भी न कभी रास आऊँ मैं हाँ सल्तनत में दर्द की ये फैसला हुआ
मिट ना सकेगा ये किसी सूरत भी अब कभी नज़दीकियों के दरम्यान जो फासला हुआ
जब से खँगालने चले तहखाने नींद के अश्क़ों की बगावत में ख़्वाब था डरा हुआ
अक्सर ये सोचता हूँ क्या है मेरा वज़ूद मैं एक अजनबी से बदन में पड़ा हुआ
थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ
है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ
मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ
अब थम गया नदीश तेरी ख़िल्वतों का शोर हाँ मिल गया है दर्द कोई बोलता हुआ

चित्र साभार- गूगल

मेरे एहसास की तितली

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लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं
वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं
नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं
कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं
कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं
ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं
कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं
चित्र साभार- गूगल

कितना बवाल था

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शबे-वस्ल तेरी हया का कमाल था सुबह देखा तो आसमां भी लाल था
कटे हैं यूँ हर पल ज़िन्दगी के अपने नफ़स नफ़स में वो कितना बवाल था
जवाब देते अहले-जहां को, तो क्या तुझी से बावस्ता हर एक सवाल था
चमकता है जो मेरी आँखों में अब भी वो रूहानी पल जो लम्हा-ए-विसाल था
कटे ज़िन्दगी इस तरह कि कहें सब नदीश सच में जैसा भी था बस कमाल था
चित्र साभार- गूगल

रिश्तों की ये पतंग

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तिल गुड़ की खुश्बू सोंधी ये ख़ास खो न जाये पुरखों की जो विरासत है पास, खो न जाये
उलझे न साज़िशों में रिश्तों की ये पतंग अपनों को गिराने में एहसास खो न जाये
मेले ख़ुशी के जितने भी आएं ज़िन्दगी में पर दुख में याद रखना कि आस खो न जाये
सुख की पतंग उलझे गर दुख की मुंडेरों पे छूटे न डोर मन की विश्वास खो न जाये
मिलजुल के आज सोचें आओ नदीश हम सब दुनिया से मुहब्बत की ये प्यास खो न जाये
चित्र साभार- गूगल

ख़ुश्बू आँखों में

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ख़्वाब तेरा करता है वो जादू आँखों में भर उठती है ख़्वाब की हर ख़ुश्बू आँखों में
क़त्ल बताओ कैसे फिर मेरा न होता रक्खे थे उसने लम्बे चाकू आँखो में
मचल मचल जाती है ये दीदार को तेरे अब हमको भी रहा नहीं काबू आँखों में
दर्द कोई जब दिल को मेरे छेड़े आकर जोर से हँसते हैं मेरे आंसू आँखों में
ऐ नदीश जिसपे भी किया भरोसा तूने चला गया है झोंक के वो बालू आँखों में
चित्र साभार- गूगल

कुछ नहीं

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ग़र मेरे एहसास कुछ नहीं तो फिर मेरे पास कुछ नहीं
आँखों में ये आँसू तो हैं हाँ कहने को खास कुछ नहीं
कितने रिश्ते-नाते मेरे होने का आभास कुछ नहीं
ज़िन्दा जो मेरी सांसों से उससे भी अब आस कुछ नहीं
अब नदीश मिलने आये हो ज़िस्म बचा है सांस कुछ नहीं
चित्र साभार- गूगल